संतान सप्तमी व्रत - अच्छी संतान के लिए आज रात जरूर करें ये काम

संतान सप्तमी व्रत - अच्छी संतान के लिए आज रात जरूर करें ये काम

deepak deewan | Publish: Sep, 16 2018 02:14:00 PM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

अच्छी संतान के लिए आज रात जरूर करें ये काम

जबलपुर- संतान सप्तमी व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान प्राप्ति, संतान रक्षा और संतान की उन्नति के लिए किया जाता है। इस व्रत में भगवान शिव एवं माता गौरी की पूजा का विधान होता है।


सप्तमी व्रत विधि- पंडित जनार्दन शुक्ला के अनुसार सप्तमी का व्रत माताओं के द्वारा किया अपनी संतान के लिए किया जाता है। प्रात:काल में श्रीविष्णु और भगवान शिव की पूजा अर्चना करनी चाहिए और सप्तमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए। सप्तमी तिथि के व्रत में नैवेद्य के रूप में खीर-पूरी तथा गुड़ के पुए बनाए जाते हैं। इस व्रत में गुड़ के पुए का सबसे ज्यादा महत्व है। दिनभर व्रत रहने के बाद रात को पूजा-आरती कर गुड़ के पुए खाते जाते हैं।


संतान सप्तमी व्रत कथा- पंडित दीपक दीक्षित बताते हैं कि सप्तमी व्रत की कथा के अनुसार एक बार श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि किसी समय मथुरा में लोमश ऋषि आए थे। मेरे माता-पिता देवकी तथा वसुदेव ने भक्तिपूर्वक उनकी सेवा की तो ऋषि ने उन्हें कंस द्वारा मारे गए पुत्रों के शोक से उबरने के लिए उन्हें संतान सप्तमी का व्रत करने को कहा। लोमश ऋषि उन्हें व्रत का पूजन-विधान बताकर व्रतकथा भी बताते हैं - नहुष अयोध्यापुरी का प्रतापी राजा था। उसकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। उसके राज्य में ही विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम रूपवती था। रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती में परस्पर घनिष्ठ प्रेम था। एक दिन वे दोनों सरयू में स्नान करने गईं। उन स्त्रियों ने वहीं पार्वती-शिव की प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक उनका पूजन किया। तब रानी चंद्रमुखी तथा रूपवती ने उन स्त्रियों से पूजन का नाम तथा विधि पूछी। उन स्त्रियों में से एक ने बताया - यह व्रत संतान देने वाला है। उस व्रत की बात सुनकर उन दोनों सखियों ने भी जीवन-पर्यन्त इस व्रत को करने का संकल्प किया और शिवजी के नाम का डोरा बांध लिया। किन्तु घर पहुंचने पर वे संकल्प को भूल गई। फलत: मृत्यु के पश्चात रानी वानरी तथा ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में पैदा हुई। कालांतर में दोनों पशु योनि छोडकऱ पुन: मनुष्य योनि में आई। चंद्रमुखी मथुरा के राजा पृथ्वीनाथ की रानी बनी तथा रूपवती ने फिर भूषणा के रूप में ब्राह्मण के घर जन्म लिया। भूषणा का विवाह राजपुरोहित अग्निमुखी के साथ हुआ। इस जन्म में भी उन दोनों में बड़ा प्रेम हो गया। व्रत भूलने के कारण ही रानी इस जन्म में भी संतान सुख से वंचित रही। भूषणा ने व्रत को याद रखा था। इसलिए उसके गर्भ से आठ पुत्रों ने जन्म लिया। रानी ईश्वरी के पुत्रशोक की संवेदना के लिए एक दिन भूषणा उससे मिलने गई। उसे देखते ही रानी के मन में इर ईष्र्या पैदा हो गई और उसने उसके बच्चों को मारने का प्रयास किया किन्तु बालक न मर सके। उसने भूषणा को बुलाकर सारी बात बताई और फिर क्षमायाचना करके उससे पूछा- किस कारण तुम्हारे बच्चे नहीं मर पाए। भूषणा ने उसे पूर्वजन्म की बात स्मरण कराई। यह सब सुनकर रानी ईश्वरी ने भी विधिपूर्वक संतान सुख देने वाला यह व्रत रखा। व्रत के प्रभाव से रानी ने एक बालक को जन्म दिया।


व्रत पूजन- पंडित सोमेश द्विवदी बताते हैं कि व्रत की कथा सुनने के बाद सायं काल में शिव-पार्वती की पूजा धूप, दीप, फल-फूल और सुगंध से करते हुए नैवेद्य का भोग लगाना चाहिए और भगवान शिव की आरती करनी चाहिए।

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