श्राद्धपक्ष 2018 - मौत के बाद पिता ले लेते हैं इस देवता का रूप, जानिए ये खास रहष्य

श्राद्धपक्ष 2018 - मौत के बाद पिता ले लेते हैं इस देवता का रूप, जानिए ये खास रहष्य
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deepak deewan | Updated: 25 Sep 2018, 08:38:18 AM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

श्राद्ध संस्कार- जानिए ये खास रहष्य

जबलपुर। श्राद्धपक्ष शुरु हो गए हैं। घर-घर में श्राद्ध संस्कार किए जा रहे हैं। शास्त्रों के अनुसार मृतक के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड तथा दान ही श्राद्ध कहा जाता है और जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी औध्र्व दैहिक क्रिया-कर्म सम्पन्न हो जाते हैं, उसी को पितर कहा जाता है। पंडित दीपक दीक्षित बताते हैं कि वायु पुराण में लिखा है कि मेरे पितर, जो प्रेतरुप हैं, तिलयुक्त जौं के पिण्डों से वह तृप्त हो। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चाहे वह चर हो या अचर हो, मेरे द्वारा दिए जल से तृप्त हो। श्राद्ध के मूल में उपरोक्त श्लोक की भावना छिपी हुई है।


सावन माह की पूर्णिमा से ही पृथ्वी पर आ जाते है पितर
ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध करने की परम्परा वैदिक काल के बाद से आरम्भ हुई थी। शास्त्रों में दी विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मंत्रों के साथ दी गई दान-दक्षिणा ही श्राद्ध कहलाता है, जो कार्य पितरों के लिए श्रद्धा से किया जाए वह श्राद्ध है। प्राचीन साहित्य के अनुसार सावन माह की पूर्णिमा से ही पितर पृथ्वी पर आ जाते है। वह नई आई कुशा की कोंपलों पर विराजमान हो जाते है। श्राद्ध अथवा पितृ पक्ष में व्यक्ति, जो भी पितरों के नाम से दान तथा भोजन कराते हैं अथवा उनके नाम से जो भी निकालते हैं, उसे पितर सूक्ष्म रुप से ग्रहण करते है। ग्रंथों में तीन पीढिय़ों तक श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। पुराणों के अनुसार यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते है, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकते है।


पिता को माना जाता है वसु के समान
पंडित जनार्दन शुक्ला के अनुसार तीन पूर्वज पिता, दादा तथा परदादा को तीन देवताओं के समान माना जाता है। पिता को वसु के समान माना जाता है। रुद्र देवता को दादा के समान माना जाता है। आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते है। शास्त्रों के अनुसार यह श्राद्ध के दिन श्राद्ध कराने वाले के शरीर में प्रवेश करते हैं अथवा ऐसा भी माना जाता है कि श्राद्ध के समय यह वहां मौजूद रहते हैं और नियमानुसार उचित तरीके से कराए गए श्राद्ध से तृप्त होकर वह अपने वंशजों को सपरिवार सुख तथा समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध कर्म में उच्चारित मंत्रों तथा आहुतियों को वह अपने साथ ले जाकर अन्य पितरों तक भी पहुंचाते हैं।

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