scriptSlaughtering trees The peace of Narmada Valley is being snatched away | हरियाली का बेहिसाब हुआ कत्लेआम! तेजी से छिन रहा नर्मदा वैली का सुकून | Patrika News

हरियाली का बेहिसाब हुआ कत्लेआम! तेजी से छिन रहा नर्मदा वैली का सुकून

चिंताजनक स्थिति; नर्मदा वैली का सुकून देने वाला शहर बन रहा ‘प्रदूषण का टैंक’
पांच साल में हजारों पेड़ काटे, तैयार गिनती के भी नहीं हुए
ठेकेदारों ने हाइवे को बना दिया पेड़ों का ‘कत्लगाह’, चौड़ी सडक़ों पर छाई रहती है वीरानी
-दमघोंटू वायु प्रदूषण का कसता जा रहा शिंकजा
-नवंबर में सबसे ज्यादा खराब हुई हवा
-खतरनाक हुआ एक्यूआई का स्तर
-वातावरण में तेजी से बढ़ रही कार्बन और हानिकारक डस्ट की मात्रा
-प्रदूषण सोख पाना बची हरियाली के बूते की बात नहीं
-नवनिर्मित हाइवे के डिवाइडर हो गए हैं उजाड़

जबलपुर

Published: November 18, 2021 09:16:34 pm

जबलपुर। नर्मदा वैली की प्रदूषण मुक्त, शांत और सुकून वाली जगह के रूप में पहचान है। लेकिन, कुछ वर्षों में हरियाली इतनी तेजी से सिमटी है कि वैली की गोद में बसे शहर जबलपुर में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच गया। नवंबर में पहली बार हवा की गुणवत्ता अति स्तरहीन श्रेणी को छू गई। एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 325 के पार हो गया। आमतौर पर एक्यूआई 100 के भीतर बेहतर माना जाता है। जाहिर है, लोग विकास के नाम पर हरियाली उजाडऩे की कीमत चुका रहे हैं। बीते एक दशक में पेड़ कटाई के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। जबलपुर को जोडऩे वाले विभिन्न हाइवे निर्माण के लिए पांच साल में हजारों पेड़ काटे गए। इसके अलावा चोरी-छिपे तो पेड़ों की बेहिसाब कटाई हुई। काटे गए पेड़ों की तुलना में दस गुना पौधरोपण के निर्देश निर्माण ठेकेदारों की मनमानी के सामने हवा हो गए। पेड़ लगाने की ज्यादातर कवायद कागजी साबित हुई। यही वजह है कि अब वातावरण में जिस भारी मात्रा में कार्बन और हानिकारक डस्ट बढ़ रही है, उसे सोख पाना बची हुई हरियाली के बूते की बात नहीं रही।
काटे फलदार-छायादार विशालकाय पेड़, लगाए शोपीस
सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक फोरलेन निर्माण (नेशनल हाइवे-12) के लिए जबलपुर से हिरन नदी के बीच 55 किमी के दायरे में 6435 पेड़ काटे गए। इनमें आम, बबूल, कोहा, इमली, बरगद, रिमझा, नीम, महानीम, सतकटा, पीपल, समेरा के वर्षों पुराने विशालकाय फलदार और छायादार पेड़ों को धराशायी किया गया। इनके एवज में 2019 से अब तक 6497 पेड़ लगाने का दावा किया गया। इनमें अर्जुन, कचनार, केसिया, जामुन, नीम, पीपल, शीशम और सप्तपर्णी किस्म के पौधे शामिल हैं। इन्हें फोरलेन के दाईं और बाईं तरफ रोपे जाने की बात दर्ज कराई गई। रिकॉर्ड में सौ फीसदी जीवित होने का भी जिक्र किया गया। लेकिन, ‘पत्रिका’ की पड़ताल में चौंकाने वाली जमीनी हकीकत सामने आई है। नवनिर्मित हाइवे के डिवाइडर उजाड़ हो चुके हैं। इसके दोनों ओर ट्रीगार्ड तक नजर नहीं आते। अंधाधुंध कटाई के बावूजद पेड़ लगाने को लेकर अन्य फोरलेन ठेकेदारों की कोताही एक जैसी है। जबलपुर-रीवा, जबलपुर-कटनी और जबलपुर-दमोह मार्ग पर सम्बंधित निर्माण एजेंसियों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन तक नहीं किया, जिसमें काटे गए पड़ों की तुलना में दस गुना लगाने के निर्देश दिए गए थे। इसे लेकर पिछले दिनों एनजीटी में याचिका दायर की गई थी।
यहां इतने पेड़ काटे गए
- एनएच-12 जबलपुर से हिरन नदी के बीच-6435 काटे गए इनमें
2017-18 में 1117
2018-19 में 1376
-जबलपुर-भोपाल मार्ग निर्माण में- 17,000
- रीवा-कटनी-जबलपुर-लखनादौन स्टेट हाईवे-7 पर-34,134
दमघोंटू होने लगी हवा
बीते एक दशक में नर्मदा वैली के लाडले शहर की फिजा तेजी से बदली है। जबलपुर के आसपास इंडस्ट्री व वाहनों से निकलने वाला कार्बन हो या क्रशर और बेतरतीब निर्माण से उठने वाली धूल, वैली की हरियाली पहले आसानी से सोख लेती थी। लेकिन, विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले पांच साल में प्रदूषण का जहर सोखने की क्षमता में तेजी से कमी आई। अब बचे हुए पेड़ों पर ही डस्ट व कार्बन पार्टिकल की परत जमने लगी है। यही वजह है कि दिवाली के बाद शहर के वातावरण में एक्यूआई साढ़े तीन सौ के आंकड़े को छू गया है।
पेड़ कटते गए, एक्यूआई बढ़ता गया (नवंबर की स्थिति)
वर्ष-एक्यूआई
2020-21 - 325
2019-20 - 205
2018-19, 99.02
2017-18, 85.04
फसलों का उत्पादन भी होगा प्रभावित
पर्यावरणविद् एबी मिश्रा का कहना है कि नर्मदा हरित क्षेत्र के साथ ही बड़ी संख्या में तालाब, तलैया की मौजूदगी के कारण जबलपुर की आबोहवा खुशनुमा रही है, तापमान बढऩे पर लोकल क्लाउड एक्टिव हो जाते थे और बारिश हो जाती थी। लेकिन जिस तरह से पिछले सालों में सौ साल से ज्यादा पुराने पेड़ों की कटाई हुई है, हरित क्षेत्र सिमटता जा रहा है। इसका सीधा असर स्थानीय स्तर पर बारिश पर भी पड़ा है। पिछले सालों में बारिश का स्तर भी कम हो रहा है। इतना ही नहीं वायु प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा है। अगर ये ही स्थिति रही तो आने वाले एक दशक में वायु प्रदूषण इतना बढ़ सकता है की फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा।
- जबलपुर-भोपाल हाईवे के किनारे अनुबंध अनुसार बांगर कंस्ट्रक्शन कम्पनी ने पौधरोपण किया है। कुछ पौधे खराब भी हुए। उनकी जगह दोबारा पौधे लगाए जाएंगे।
आरबी सिंह, एजीएम, एमपीआरडीसी
Slaughtering trees
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