इसलिए महिलाओं की जुबान पर नहीं टिकती कोई राज की बात, जानिए खास रहस्य

इसलिए महिलाओं की जुबान पर नहीं टिकती कोई राज की बात, जानिए खास रहस्य

Premshankar Tiwari | Publish: Dec, 07 2017 05:16:44 PM (IST) Jabalpur, Madhya Pradesh, India

युधिष्ठिर ने दिया था श्र्राप, तब से औरतों को नहीं बताई जातीं कोई गोपनीय बातें

जबलपुर। किंवदंति प्रचलित है कि महिलाओं की जुबान पर कोई राज की बात नहीं टिकती। इसका कारण वह श्राप है, जो युधिष्ठिर ने कर्ण के वध के बाद अपनी ही माता कुंती को दिया था। इस किंवदंति के चलते आज भी कई लोग स्त्रियों को अपने खास राज नहीं बताते। यह बात अलग है आज महिलाएं चांद पर पहुंच गई हैं। वह किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं। सरकार की बड़ी-बड़ी खुफिया एजेंसियां तक हमारी हुनरमंद बेटियों के दम पर चल रही हैं। बात किंवदंतियों की है। आइए इस तरह की और भी किंवदंतियों से आपको अवगत कराते हैं।

पुत्र ने दिया श्राप
ज्योतिषाचार्य पं. जनार्दन शुक्ल के अनुसार महाभारत युद्ध के दौरान पुत्र युधिष्ठिर ने ही अपनी माता को श्राप दिया था। कथा है कि महाभारत युद्ध के समय अजुर्न द्वारा कर्ण का वध किए जाने का समाचार सुनकर माता कुंती भाव विह्वल हो गईं। वे कर्ण की मृत देह के समीप जाकर विलाप कर रही थीं, तभी भगवान श्रीकृष्ण के साथ युधिष्ठिर वहां पहुंच गया। शत्रु पक्ष के योद्धा कर्ण की मृत्यु पर माता को शोक करते हुए देखकर युधिष्ठिर हैरान रह गए। बाद में माता कुंती ने उन्हें यह रहस्य बताया कि कर्ण उनका भाई था। सभी पांडव इस बात को सुनकर दुखी हुए। उन्होंने माता कुंती को श्राप दिया कि आज से संसार की कोई भी स्त्री गोपनीय बातों का रहस्य छुपा नहीं पाएगी। इस श्राप के बाद युधिष्ठिर ने विधि विधान पूर्वक कर्ण का अंतिम संस्कार किया।

परीक्षित को मिला यह श्राप
कथा आती है कि जब पांडवों ने स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान किया तो सारा राज्य अभिमन्यु के पुत्र परिक्षित को सौंप दिया। राजा परिक्षित के शासन काल में सभी प्रजा सुखी थी। एक बार राजा परिक्षित वन में खेलने को गए तभी वहां उन्हें शमिक नाम के ऋषि दिखाई दिए। वह अपनी तपस्या में लीन थे, उन्होंने मौन व्रत धारण कर रखा था। जब राजा ने उनसे कई बार बोलने का प्रयास करते हुए भी उन्हें मौन पाया तो क्रोध में आकर उन्होंने ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया। जब यह बात ऋषि शमिप के पुत्र को पता चली तो उन्होंने राजा परिक्षित को श्राप दिया कि आज से 7 दिन बाद राजा परिक्षित की मृत्यु तक्षित सांप के डसने से हो जाएगी। राजा परिक्षित के जीवित रहते कलयुग में इतना साहस नहीं था कि वह हावी हो सके परंतु उनकी मृत्यु के बाद कलयुग पृथ्वी पर हावी हो गया।

पांडु को श्राप
पांडवों के पिता महाराज पांडु को भी एक ऋषि ने श्राप दिया था। यही कारण है कि छोटी रानी के संपर्क में आने के समय उनकी मृत्यु हो गई। कथा है कि एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री - के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को श्राप दिया, "राजन! तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अत: जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।" इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दु:खी हुये और अपनी रानियों से बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूंगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दु:खी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी। बाद में कुंती और माद्री ने देवताओं का आह्वान किया। इसके बाद कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र नकुल व सहदेव हुए।

अश्वथामा को श्राप
महाभारत के युद्ध में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पांडव पुत्र का वध कर दिया, तब पांडव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम पहुंच गए। तो अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र से पांडवों पर वार किया। यह देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया। महर्षि वेदव्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया। और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापिस मांगे। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापिस ले लिया। लेकिन अश्वत्थामा यह विद्या नहीं जानता था। इसलिए उसने अपने शस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उतरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम हजारों वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे। और किसी भी जगह किसी भी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे। दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे। माना जाता है कि अश्वथामा आज भी पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं।

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