तीन तलाक के कानून को मुस्लिम महिला ने दी चुनौती, उठाया ये गंभीर सवाल

तीन तलाक के कानून को मुस्लिम महिला ने दी चुनौती

By: Premshankar Tiwari

Published: 18 Dec 2018, 03:37 PM IST

जबलपुर। केंद्र सरकार की ओर से तीन तलाक के संबंध में पारित अध्यादेश को एक मुस्लिम महिला ने मप्र हाईकोर्ट में चुनौती दी है। चीफ जस्टिस एसके सेठ व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता व केंद्र सरकार के अधिवक्ता को अगली सुनवाई में मामले पर बहस के लिए तैयारी करके आने के निर्देश दिए । अगली सुनवाई 19 जनवरी को होगी, तभी कोर्ट का रुख स्पष्ट हो सकेगा।

यह है मामला
भोपाल निवासी समरीन जिशान सिद्दीकी पेशे से शिक्षिका हैं। समरीन ने यह याचिका दायर कर सरकार द्वारा 2018 में पारित किए गए तीन तलाक के अध्यादेश को चुनौती दी है। अधिवक्ता अमित खत्री ने कोर्ट को बताया कि इस अध्यादेश में 3 साल की सजा का प्रावधान है। इसके अलावा यह भी व्यवस्था है कि आरोपित पति को जमानत नहीं मिलेगी। इससे इस कानून के दुरुपयोग की आशंका बलवती हो गई है। इसके प्रावधानों के तहत यदि पत्नी तीन तलाक के मामले में झूठी शिकायत भी करती है तो पति तत्काल जेल चला जाएगा, उसकी जमानत भी नहीं होगी। याचिका में उक्त अध्यादेश की वैधता व इसके मापदण्डों की फिर से जांच व इन पर पुनर्विचार करने की मांग की गई। प्रारंभिक सुनवाई के बाद कोर्ट ने अगली सुनवाई पर दोनों पक्षों को पूरी तैयारी के साथ उपस्थित रहने के निर्देश दिए।

सुको ने ये दिया था फैसला
उल्लेखनीय है कि अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय में मुस्लिम समाज में एक बार में तीन बार तलाक देने की प्रथा को निरस्त करते हुए अपनी व्यवस्था में इसे असंवैधानिक, गैरकानूनी और शून्य करार दिया है। कोर्ट ने कहा था कि तीन तलाक की यह प्रथा कुरान के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अपने 365 पेज के फैसले में कहा, 3:2 के बहुमत से दर्ज की गई अलग-अलग राय के मद्देनजर ‘तलाक-ए-बिद्दत’ तीन तलाक को निरस्त किया जाता है। प्रधान न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर ने तीन तलाक की इस प्रथा पर छह महीने की रोक लगाने की हिमायत करते हुए सरकार से कहा था कि वह इस संबंध में कानून बनाए जबकि न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन और न्यायमूर्ति उदय यू ललित ने इस प्रथा को संविधान का उल्लंघन करने वाला करार दिया था। बहुमत के फैसले में कहा गया कि तीन तलाक सहित कोई भी प्रथा जो कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ है, अस्वीकार्य है। तीन न्यायाधीशों ने यह भी कहा था कि तीन तलाक के माध्यम से विवाह विच्छेद करने की प्रथा मनमानी है और इससे संविधान का उल्लंघन होता हैं, इसलिए इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

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Premshankar Tiwari Desk
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