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हल चलते नहीं, बैलगाडिय़ों का जमाना नहीं रहा, आखिर गोवंश का इस्तेमाल कहां करें?

आवारा मवेशियों के मामले में पशुमालिकों का असमंजस, बोर्ड कर रहा बड़ी तैयारी, गोवंश की सुरक्षा के लिए करेंगे पुख्ता इंतजाम

 

जबलपुर

Published: December 04, 2021 07:58:40 pm

श्याम बिहारी सिंह ञ्च जबलपुर। कचरे के ढेर पर पॉलीथिन खाते गोवंश। सड़कों, चौराहों, खेतों में गोवंश का का जमावड़ा। चोरी छिपे क्रूरतापूर्वक ट्रकों पर मवेशियों का परिवहन। हाइवे पर वाहनों से टकराकर मौत। मवेशियों को बचाने के चक्कर में घायल होते वाहन चालक। इन दृश्यों पर लगाम लगाने के लिए फिलहाल कोई कारगर सरकारी रणनीति दिख नहीं रही है। सरकार ने गोवंश के संरक्षण के लिए नीतियां बना दीं। उनका पालन कराने के लिए गोपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड का गठन भी कर दिया। इसके बाद भी मवेशी खेतों में फसलें खा रहे हैं। इससे किसान परेशान हैं। उनका आरोप पालकों पर है कि वे जानबूझकर मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं। उधर, गोवंश पालकों का कहना है कि सभी एक जैसे नहीं हैं। यह सही है कि कुछ लोग सरकारी नीति का गलत फायदा उठा रहे हैं। लेकिन, ज्यादातर लोग इस बात से परेशान हैं कि वे गोवंश करें क्या? गायें तो दूध के लिए आजीवन पाली जा सकती हैं। बड़ी समस्या है कि गोवंश का क्या करें? अब हल चलते नहीं। बैलगाडिय़ां भी गायब हो गई हैं। बैलों को बेचना भी चाहें तो कहां बेचें? उन्हें खरीदेगा कौन? चारा इतना महंगा है कि बैलों को हमेशा के लिए सिर्फ बांधकर खिलाना किसी के वश में है नहीं। ऐसे में सरकार को ही कुछ करना पड़ेगा।
गोबर का करना होगा सही इस्तेमाल
सरकार ने गोवंश के संरक्षण का भी नियम बनाया है, तो उन्हें बूचडख़ाने भेजने की बात करना बेमानी है। ऐसे में जानकारों का कहना है कि सरकार को गोबर के इस्तेमाल की सही योजना बनानी पड़ेगी। जिला प्रशासन को पशुपालकों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना होगा कि वे जैविक खाद का बड़े पैमाने पर उत्पादन करें। इससे रोजगार के साधन भी बनेंगे। साथ में गोवंश की बेकदरी भी रुक जाएगी। किसानों को सस्ती खाद मिलेगी। फसल उत्पादन बढ़ेगा। अनाज की गुणवत्ता बढ़ेगी। इस मामले में गोपालन एवं पशुसम्बर्धन बोर्ड, मप्र के अध्यक्ष स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि का कहना है कि गोवंश को गोअभयारण्य और गोशालाओं में पहुंचाने से सभी समस्याएं हल हो जाएंगी।
सामाजिक संगठन भी आगे आएं
मवेशियों की हालत देखकर आम सामाजिक संगठनों को अब आगे आना होगा। कुछ एनजीओ इस क्षेत्र में अच्छा काम कर भी रहे हैं। आंकड़े बता रहे हैं कि एनजीओ से संचालित गोशालाएं अच्छे ढंग से काम कर रही हैं। वहां गोवंशों की संख्या भी पर्याप्त है। उनकी देखभाल भी ठीक तरीके से होती है। यह जरूर है कि सरकारी गोशालाओं में अव्यवस्थाओं की शिकायतें लगातार आती रहती हैं। वहां चारे की समस्या आम है। ठंड में पशुओं के बीमार होने की खबरें भी आती हैं। इसलिए आमधारण बन गई है कि गोशालाओं में पशुओं की देखभाल नहीं होती। इसके साथ समस्या यह भी है कि मवेशियों को गोशालाओं तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आम व्यक्ति नहीं उठा रहा है।

cow
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'गोवंश कभी अनुपयोगी नहीं होते
'सनातन धर्म में गो और गोवंश का महत्व हमेशा से रहा है। हम मानते आए हैं कि गाय हमारी माता है। यह राजनीतिक नहीं, सामाजिक मुद्दा है। गोवंश समाज की भावनाओं से जुड़े हैं। यह माना जाना चाहिए कि गोवंश कभी भी अनुपयोगी नहीं होते। हां, यह मान सकते हैं कि गोवंश का खेतों में, बैलगाडिय़ों में उपयोग कम हुआ है। लेकिन, उनके गोबर का इस्तेमाल कई मायनों में महत्वपूर्ण है। जैविक खाद के अलावा गोबर गैस प्लांट बनाए जा सकते हैं। इससे बिजली, बायोगैस का उत्पादन हो सकता है। गोपालन एवं पशुसम्बर्धन बोर्ड, मप्र की ओर से इस दिशा में काम किया जा रहा है। कोशिश है कि प्रदेश के सभी जिलों में एक मॉडल गोशाला बनाई जाएगी। वहां केंद्र सरकार के अनुदान से गोबर गैस प्लांट बनाए जाएंगे। मान भी लें कि अभी गोबर गैस प्लांट बनने में समय लग रहा है। लेकिन, गोवंश को गोशालाओं और गोअभयारण्य में रखे जाने की व्यवस्था है। पशुमलिक गायों को अपने पास रखें। गोवंशों को गोशालाओं और अभयारण्य में पहुंचाएं। इसके लिए गांव की समितियां मदद करती हैं। एनजीओ भी मदद करते हैं। पशुपालकों को समझना होगा कि गोवंश सिर्फ सरकार या बोर्ड की जिम्मेदारी नहीं हैं। यह व्यक्तिगत और सामाजिक जिम्मेदारी भी हैं। इसके अलावा गोपालन एवं पशुसम्बर्धन बोर्ड की कोशिश है कि चरनोई की भूमि भी विस्तारित की जाए। इसके लिए सम्बंधित विभागों से चर्चा चल रही है। हम व्यक्तिगत और बोर्ड की तरफ से भी लोगों से दान करने की अपील कर रहे हैं। लोग गोग्रास के तहत रोजाना 10 रुपए दान करें।
स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि, अध्यक्ष, गोपालन एवं पशुसम्बर्धन बोर्ड, मप्र

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