संस्कारधानी के जर्रे-जर्रे में रिसता है योग, शहर ने दुनिया को बताया-हवा में तैर भी सकते हैं

संस्कारधानी के जर्रे-जर्रे में रिसता है योग, शहर ने दुनिया को बताया-हवा में तैर भी सकते हैं
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Shyam Bihari Singh | Updated: 21 Jun 2019, 08:00:00 AM (IST) Jabalpur, Jabalpur, Madhya Pradesh, India

यहां की धरती ने दुनिया को दिए आधुनिक योग के प्रणेता

जबलपुर। ऋ षि जाबालि की तपोस्थली संस्कारधानी ने दुनिया को आधुनिक युग में योग के दो प्रणेता दिए। महर्षि महेश योगी और आचार्य रजनीश ने यहां के सुरम्य वातावरण में योग की कठिन साधना कर सिद्धि हासिल की। दुनियाभर में योग का विस्तार किया। दुनियाभर में उनके नाम से योग साधना केंद्र चल रहे हैं। आचार्य रजनीश 'ओशोÓ ने महत्वाकांक्षाओं के बाद ही समाधि की सफ लता पर बल दिया। महर्षि योगी ने भावातीत ध्यान के माध्यम से बताया कि योग बल हासिल कर लिया जाए, तो हवा में भी तैरा जा सकता है। संस्कारधानी के जर्रे-जर्रे में योग रचा-बसा है।
मौजूद है साधना शिला
आचार्य रजनीश की साधना शिला देवताल स्थित शैलपर्ण उद्यान में आज भी मौजूद है। इसी पर उन्होंने कई वर्षों तक साधना की। भंवरताल स्थित मौलश्री के पेड़ के नीचे उन्हें सिद्धि हासिल हुई। दुनियाभर से आने वाले ओशो के अनुयायी सिद्धि स्थल और मौलश्री के दर्शन करने आते हैं।
योग में जीवन की सार्थकता
आचार्य रजनीश ने बताया कि पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण कर भौतिक साधन जुटाए जा सकते हैं, लेकिन मन की शांति के लिए भारत का योग ही सर्वश्रेष्ठ साधन है। उन्होंने आत्मशांति के लिए अध्यात्म का रास्ता दिखाया है। ओशो के अनुयायी स्वामी शिखर के अनुसार आचार्य ने बताया कि योग में ही जीवन की सार्थकता छिपी है।
देवताल को बताया हिमालय
ओशो ने देवताल को अपना हिमालय बताया है। उन्होंने लिखा है-'इस हिमालय में आकर मैं ऊर्जा से लबरेज हो जाता हूं। ऐसी पहाडिय़ां देश में कहीं नहीं मिलेंगी, जिन पर बैठकर मैं ऊर्जा प्राप्त कर सकूं और उसे पूरे विश्व में बांट सकूं।Ó
बनाना चाहते थे योग व आध्यात्म केंद्र
आचार्य रजनीश जबलपुर स्थित देवताल को अंतरराष्ट्रीय अध्यात्म वायु केंद्र के रूप में विकसित करना चाहते थे। लेकिन, आवागमन के साधनों की कमी के चलते अनुयायियों को होने वाली कठिनाइयों को देखते हुए महाराष्ट्र के पुणे में केंद्र की स्थापना की।
योग पर लिखा साहित्य
ओशो ने अन्य विषयों के साथ ही योग पर कई साहित्य लिखे हैं। उनकी लिखी किताबों का कई विदेशी भाषाओं में भी अनुवाद किया गया है।
जीसीएफ की नीलगिरी पहाड़ी पर महर्षि ने हासिल की सिद्धि
महर्षि महेश योगी ने दुनियाभर में योग का प्रचार-प्रसार किया। उन्होंने लम्बी साधना के बाद जीसीएफ से लगी नीलगिरी पहाड़ी पर स्थित हनुमान मंदिर के पास सिद्धि हासिल की थी। इस स्थल को हनुमान टोरिया के नाम से भी जाना जाता है। महर्षि के अनुयायी यहां साधना और उपासना के लिए पहुंचते हैं। लेकिन, नगर निगम प्रशासन की ओर से बजट जारी किए जाने के बाद भी ये बदहाल है।
हवा में तैरने की शक्ति
भावातीत ध्यान से जुड़े योगाचार्यों के अनुसार योग की इस विधा के जरिए हवा में तैरना सम्भव है। महर्षि इस विधा में सिद्धहस्त थे। ध्यान के दौरान कई बार वे आसन से उठकर हवा में तैरने लगते थे। वे कहते थे कि सतत अभ्यास से हर व्यक्ति इसमें पारंगत हो सकता है।
हिमालय पर दो साल साधना
महर्षि ने हिमालय में भी दो साल मौन साधना की थी। उन्होंने एक कार्यक्रम में चार लाख अमेरिकी युवाओं को सम्बोधित किया। उन्होंने बताया कि योग के माध्यम से स्वयं को स्वस्थ रखने के साथ मानसिक शांति भी प्राप्त की जा सकती है।
करौंदी में ध्यान केंद्र
देश के भौगोलिक केंद्रबिंदु करौंदी में महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय का ध्यान केंद्र स्थित है। वहां आध्यात्मिक और योग साधना निरंतर जारी रहती है। दुनियाभर से महर्षि के अनुयायी योग की विधाओं में स्वयं को पारंगत होने के लिए यहां आते हैं।

खमरिया लेक में है योग और ध्यान केंद्र
खमरिया लेक का सौंदर्य देखते ही बनता है। उससे भी ज्यादा आकर्षक ध्यान एवं योग केंद्र है। रोजाना सुबह और शाम को करीब 200 लोग योग-साधना करते हैं। इनमें आम आदमी के साथ-साथ ऑर्डनेंस फैक्ट्री खमरिया (ओएफके) में सेना के लिए बम तैयार करने और करवाने वाले कर्मचारी और अधिकारी भी शामिल हैं। बड़ी बात यह है कि जिस जगह पर योग केंद्र है, वह पहले अपराधियों का अड्डा था। वेस्टलैंड अधिकारी आवास के निकट बने खमरिया लेक का निर्माण वर्षा जल संरक्षण के किया गया था। लेक के बगल में पौधरोपण, बगीचा एवं व्यायाम के लिए उपकरण लगाने के साथ ही मन की शांति के लिए योग एवं ध्यान केंद्र का निर्माण कराया गया। यहां आने वाले लोगों का मानना है कि योग से उनका जीवन बदला है। इसी प्रकार ओएफके प्रबंधन ने ईस्टलैंड कर्मचारी आवास के पास भी अरविंदों योगा ध्यान केंद्र एवं पर्यावरण उद्यान का निर्माण कराया है। शुक्रवार को इसका उद्घाटन होगा।

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