जब छिपकर विनोबा भावे को सुनने गए थे आचार्यश्री विद्यासागर

 जब छिपकर विनोबा भावे को सुनने गए थे आचार्यश्री विद्यासागर

बड़े भाई महावीर प्रसाद ने सुनाए आचार्यश्री के बचपन के अनूठे किस्से, पहले से ही दृढ़ निश्चयी थे विद्याधर

अवकाश गर्ग @ दमोह। कुंडलपुर में भक्तों के भीड़ के बीच एक ऐसा भी चेहरा है, जिसपर लोगों की निगाहें टिक जाती हैं। ये चेहरा है आचार्यश्री विद्यासागर के बड़े भाई महावीर प्रसाद अष्टगे का। आचार्यश्री के बचपन की बात चली तो उन्होंने कहा कि आचार्यश्री बड़े नटखट थे। एक बार सर्कस जाने की बजाए वे संत विनोबा भावे के भाषण सुनने पहुंच गए। लौकिक जीवन में वे संत विनोबा भावे से बेहद प्रभावित रहे। आचार्यश्री की पहली पुस्तक का आख्यान भी उन्ही ने लिखा था। 


महावीर प्रसाद परिजनों के साथ कर्नाटक के सद्लगा गांव से बड़े बाबा की नगरी कुंडलपुर पहुंचे है। उनका कहना है कि आचार्यश्री विद्यासागर अपने लौकिक जीवन से भले ही अलग हो चुके लेकिन अब भी हमारा मन और दिल उन्हें अपने छोटे भाई के रूप में ही पहचानता है। वो विश्व कल्याण के लिए बड़ी साधना कर रहे हैं। हमें उनका भाई कहलाने से ज्यादा खुशी उनका श्रावक कहलाने में होती है। 


दोस्तों के साथ गए भाषण सुनने
महावीर प्रसाद ने बताया कि विद्याधर (आचार्यश्री) संत संगत और आध्यात्म के प्रति काफी उत्साहित थे। सद्लगा के समीप ही एक बार भू-दान आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे के कार्यक्रम की सूचना मिली। विद्याधर उनको सुनने के लिए काफी उत्साहित थे और इस हेतु पैसे मांगने पिताजी के पास जा पहुंचे। पिताजी ने उन्हें कहा समझाया कि विनोबाजी तो जमीन मांगने आए हैं और हमारे पास तो खुद ही कम जमीन है। ऐसे में उनकी बातें सुनने से क्या लाभ। उनका भाषण सुनने का इरादा करके विद्याधर ने दोस्तों को तैयार किया। वे भाषण सुनने निकले लेकिन सारे दोस्त सर्कस देखने जा पहुंचे। इसके बावजूद विद्याधर ने मनोरंजन को छोड़कर संत विनोबाजी का पूरा भाषण सुना।


सबसे कम उम्र में बने जैन मुनि
आचार्यश्री विद्यासागर उस दौर में देश के सबसे कम उम्र के जैन मुनि बने थे। उन्होंने जब 1968 में मुनि दीक्षा ली तो वे सिर्फ 22 वर्ष के थे। महावीर प्रसाद ने बताया कि उनके परिवार में छोटे भाई शांतिनाथ (मुनि योगसागर), माता-पिता और भाई-बहन सहित 6 सदस्य दीक्षा ले चुके हैं। शांतिनाथ अब मुनियोगसागर के नाम से जाने जाते हैं। 

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