रक्षाबंधन: प्रेमिका की राखी ने बचाई थी सिकंदर की जान...जानिए क्या है कहानी

भारतीय नरेश पोरस को राखी बांधकर सिकन्दर की प्राण रक्षा का वचन लिया था सिकंदर की प्रेमिका ईरानी युवती ने

जबलपुर। हिंदू धर्म में राखी का क्या महत्व है इसे विश्व विजय पर निकले सिकंदर से संबंधित एक कहानी से समझा जा सकता है। जिससे पता चलता है कि राखी  केवल खून के रिश्तों तक ही सीमित नहीं है बल्कि किसी अजनबी बहन द्वारा राखी बांधने पर उसकी और उसके रिश्तों की रक्षा के लिए वचनबद्ध होना पड़ता है। यह कहानी है भारतीय राजा पोरस और सिकंदर के बीच युद्ध और पोरस द्वारा सिकंदर की जान बख्शने की जिसने एक नया इतिहास रचा और सिकंदर का हृदय परिवर्तन कर उसे अपने देश लौटने को मजबूर कर दिया।  

when lover

क्यों बांधी थी सिकंदर की प्रेमिका ने पोरस को राखी   

जब सिकंदर अपने विजय अभियान के तहत ईरान, अफगानिस्तान आदि पर विजय प्राप्त कर भारत के पंजाब क्षेत्र में पहुंचा तो उसका सामना पंजाब में उस समय महाराज पोरस यानी पुरु से हुआ। सिकंदर ने बिना किसी युद्ध के अपनी आधीनता स्वीकार कराने के लिए महाराजा पुरु के पास अपना दूत भेजा जिसे पुरु ने ठुकरा दिया। जिसके बाद यूनानी सैनिकों ने पुरु के साम्राज्य को घेर लिया, और युद्ध छिड़ गया।  कई दिनों तक घमासान युद्ध हुआ, दोनों ओर के अनेक योद्धा मारे गये, लेकिन हार जीत का निर्णय नहीं हो सका। सिकंदर के साथ उसकी ईरानी प्रेमिका भी आई हुई थी। वह पुरु की बहादुरी देख-सुनकर  सिकंदर के जीवन को लेकर भयभीत थी। पड़ाव के बीच वह भारतीय संस्कृति की खोज खबर लेने निकल जाती थी। विद्रोही पक्ष की होने के बावजूद भी उसे हिंदू भारतीयों से सम्मान अपनापन मिल रहा था, जिसे देखकर वह हैरान थी। इसी बीच रक्षा बंधन का पर्व आया। भारतीय बहनें रंग-बिरंगे धागों से अपने भाइयों को बांधने के लिए राखियाँ तैयार कर रहीं थी। जिन्होंने सिकंदर की प्रेमिका को रक्षा बंधन का महत्व बताया और कहा कि इस राखी के बदले उनका भाई जीवनभर उनकी रक्षा के लिए बचनबद्ध होता है।  सिकंदर की जान की रक्षा के लिए चिंतित उसकी प्रेमिका ने रक्षाबंधन के दिन पुरु को राखी बांधने का निर्णय लिया। उसे विश्वास था कि रक्षाबन्धन के दिन वह पुरु को राखी बांधकर सिकंदर की रक्षा कर सकती है।

पोरस को बांधी राखी मिला सिकंदर की रक्षा का वचन

सिकंदर की प्रेमिका रक्षा बंधन के दिन थाली में मिठाई और राखी रखकर बेखौफ होकर अपने शिविर से पुरु के पास पहुंची और कहा अपनी छोटी बहन का प्रणाम स्वीकार करें। पुरु ने युवती का हृदय से स्वागत किया और राखी बांधने के लिए हाथ आगे बढ़ा दिया। युवती ने प्यार से पुरु को राखी बांधी मिठाई खिलाई और कहा कि शायद नहीं जानते कि मैं कौन हूं जिस पर पुरु ने कहा कि एक भाई अपनी बहिन को न जाने ये कैसे हो सकता है। यह सुन सिकंदर की प्रेमिका की आंखें छलक आईं और उसने बताया कि वह सिकंदर की प्रेमिका है और सिकंदर के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती। जिस पर पुरु ने युद्ध में सिकंदर की प्राण रक्षा का वचन दिया और कहा कि बहन के सुहाग की रक्षा करना उसका फर्ज है। पुरु ने सिकंदर की प्रेमिका को अपनी सगी बहन की तरह विदा किया और अनेक उपहार देकर उसके शिविर में भेजा।  

... और पुरु ने दिया सिकंदर को जीवनदान
 
कुछ दिन बाद जब  पुरु और सिकंदर की सेना में युद्ध प्रारंभ हुआ तो एक दिन युद्ध के दौरान ऐसी स्थिति आई कि जब पुरु सिकंदर की जान ले सकता था।  उस दिन सिकंदर घोड़े पर सवार था और पुरु हाथी पर  थे। पुरु भाले से सिकंदर पर वार करने ही वाला था पर उसे ईरानी बहन को दिया वचन याद आ गया और उसने सिकंदर को बख्श दिया। सिकंदर  यह तो जान गया था कि पुरु ने उसे जीवन दान दिया पर इसका कारण नहीं समझ सका।

when lover

सिकंदर की प्रेमिका का पुरु पर दृढ़ हुआ विश्वास 

सिकंदर ने अपनी प्रेमिका को यह बात बताई जिस पर उसके मन में अपने धर्म भाई यानी पुरु के प्रति प्रेम उमड पड़ा। उसे एक सच्चे हिंदू सम्राट के वचन निभाने का ज्ञान हो गया था। उसे यह भी लगा कि उसने अपने भाई को विजयी होने से रोक दिया है। कुछ दिनों तक निरंतर युद्ध के बाद  सिकंदर की विजय हुई और पुरु को बंदी बना लिया गया। सिकंदर अपनी विजय से खुश था, लेकिन उसकी प्रेमिका ईरानी युवती को जरा भी हर्ष नहीं था। सिकंदर ने जब इसका कारण पूछा तो उसने रक्षाबन्धन का सारा घटनाक्रम सुनाया। तब  सिकंदर को पता चला कि उस दिन युद्ध में सम्राट पुरु ने उसका वध क्यों नहीं किया था।

सिकंदर जीत कर भी हार गया

सिकंदर को एहसास हो गया था कि असली विजय सम्राट पुरु की ही हुई है।  वह पुरु के प्रति नतमस्तक हो गया। जिसके बाद उसने जीत का कोई जश्न नहीं मनाया। औपचारिकतावश जब सम्राट पुरु को बंदी के रूप में सिकंदर के दरबार में पेश किया गया तो सिकंदर के चेहरे पर अपराध बोध था जबकि पुरु के चेहरे पर तृप्त भाव थे।

when lover

सिकंदर ने लौटाया पुरु का राज्य

सिकंदर ने पुरु से पूछा, आपके साथ कैसा बर्ताव किया जाए जिस पर  पुरु ने सहज भाव से कहा, जैसा एक राजा को दूसरे राजा के साथ करना चाहिए। यह सुनते ही सिकंदर गद्दी से उठा खड़ा हुआ और आत्मीयता से पुरु को गले लगाकर आत्मजन की भांति प्रेम प्रकट किया और बोला न ही कोई हारा न जीता है। आज से हम मित्र हैं आप आयु में मुझसे बड़े हैं  इसलिए अब मैं आपका अनुज हूं। कहा जाता है कि इस घटना से प्रभावित सिकंदर ने राजा पोरस यानी पुरु का राज्य वापस लौटाया और अपने देश लौट गया। 

Show More
Ajay Khare
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned