150 किमी दूर ट्रांसफर पर आपत्ति क्यों, अधिकारी को मनचाही जगह पर काम करने का हक नहीं

हाईकोर्ट ने देवरी एसडीएम की याचिका निरस्त की

By: sudarshan ahirwa

Updated: 04 Jan 2018, 09:36 AM IST

जबलपुर. मप्र हाईकोर्ट ने कहा है कि महज डेढ़ सौ किमी दूर तबादला किए जाने पर प्रशासनिक अधिकारी को आपत्ति क्यों है? जस्टिस सुजय पॉल की कोर्ट ने कहा कि अधिकारी की पदस्थापना के लिए प्रशासनिक आवश्यकता पहली प्राथमिकता है। इसे ताक पर रखकर महज अधिकारी की सुविधा को देखते हुए उसे मनमानी जगह पर पदस्थ किए जाने का अधिकार नहीं है। इस मत के साथ कोर्ट ने दमोह जिले के देवरी एसडीएम संतोष चंदेल की याचिका निरस्त कर दी।

यह है मामला
चंदेल ने याचिका दायर कर कहा कि उनका लीवर ७० प्रतिशत काम नहीं कर रहा है। इसका इलाज जबलपुर, नागपुर व हैदराबाद में जारी है। उन्हें बार-बार वहां जाना पड़ता है। लेकिन उनके स्वास्थ्य की परवाह किए बिना ७ दिसंबर को उनका तबादला बालाघाट जिले में कर दिया गया। इसे उन्होंने अनुचित बताया। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि जबलपुर, दमोह व सागर में अपर कलेक्टर के पद रिक्त हैं। इनमें से किसी पर भी उन्हें तैनात किया जा सकता है। क्योंकि बालाघाट जबलपुर से डेढ़ सौ किमी दूर है, इसलिए इलाज के लिए उन्हें दिक्क्त का सामना करना पड़ेगा।

जबलपुर से हैं फ्लाइट
राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता एपी सिंह ने कोर्ट को बताया कि बालाघाट से जबलपुर की दूरी को देखते हुए याचिकाकर्ता जबलपुर की यात्रा कर आगे दिल्ली, नागपुर या हैदराबाद की फ़्लाइट पकड़ सकता है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक आवश्यकता और महत्व को देखते हुए याचिकाकर्ता को जबलपुर में पदस्थ नहीं किया जा सकता। सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि एेसा कोई अधिकार याचिकाकर्ता को नहीं है कि वह अपनी सुविधा के लिहाज से उपयुक्त जगह पर पदस्थ किया जावे। प्रशासनिक आवश्यकता को देखते हुए सरकार का निर्णय सही है। लिहाजा इसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।

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सेवा मामलों में जनहित याचिका पोषणीय नहीं

जबलपुर. हाईकोर्ट ने कहा है कि शासकीय सेवा संबंधी मामलों में जनहित याचिका विचारणीय नहीं है। चीफ जस्टिस हेमंत गुप्ता की डिवीजन बेंच ने इस मत के साथ ऑल इंडिया उर्दू राब्ता कमेटी के प्रेसिडेंट यूसुफ फरहत की याचिका खारिज कर दी। याचिका में प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए शिक्षकों के लंबे अरसे से दूसरे विभागों में जमे रहने को चुनौती दी गई थी।

उर्दू शायर डॉ फरहत ने याचिका में कहा था कि प्रदेश में स्कूल शिक्षा विभाग से प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में भेजे गए शिक्षक लंबे अरसे से वहीं पदस्थ है। जबकि स्कूल शिक्षा विभाग में शिक्षकों की कमी है। प्रतिनियुक्ति पर गए शिक्षक वापस मूल विभाग में आना नहीं चाह रहे हैं।

उन्होंनं मप्र उर्दू एकेडमी की सचिव नुसरत मेंहदी का उदाहरण देते हुए कहा कि वे ११ वर्षों से इस पद पर जमी हुई हैं। याचिका में मांग की गई कि प्रतिनियुक्ति पर तैनात शिक्षकों को वापस मूल विभाग में बुलाकर उनसे शिक्षण कार्य कराया जाए।

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