...तो अहमदाबाद से भी बेहतर बनेगा जबलपुर का कपड़ा


जबलपुर  नई टेक्नालॉजी और क्लस्टर की स्थापना के अभाव में जबलपुर का पावरलूम उद्योग सिमटता जा रहा है। आजादी के समय 5 हजार से ज्यादा लूम थे, अब इनकी संख्या 300 के करीब रह गई है। इस उद्योग को बढ़ावा क्लस्टर दे सकता है। मगर इस पर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि जबलपुर में मेहनतकश उद्यमी काफी हैं। केंद्र सरकार ने कुछ प्रयास किए थे, मगर प्रदेश का उद्योग विभाग इसे आगे बढ़ाने के लिए कोई कारगर योजना तैयार नहीं कर पाया है।

पावरलूम क्लस्टर की स्थापना  शहर की अहमदाबाद और सूरत जैसी मंडी से कपडे़ कीं निर्भरता को कम कर सकता है। यही नहीं यह  अर्थ उपार्जन का साधन और हजारों हाथों को रोजगार दे सकता है। फिर भी इस उद्योग को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है। नतीजा, पावरलूम गोहलपुर इलाके में लोगों के घरों के भीतर सिमटकर रह गए हंै। इन्हें बाहर निकालने के लिए कोई पुख्ता योजना नहीं होने से संचालक और इनमें काम करने वाले सैकड़ों कारीगर अपना भविष्य अंधकार में मानने लगे हैं। 

दूसरे मद में दे दी भूमि
पावरलूम क्लस्टर के लिए जमीन लेने की प्रक्रिया वर्ष 2012 से चल रही है। अभी तक इसके परिणाम सामने नहीं आए। प्रारंभ में अमखेरा में 6 एकड़ से ज्यादा भूमि क्लस्टर के लिए चिन्हित की गई थी। बाद में प्रशासन ने इसे हाउसिंग बोर्ड को हस्तांतरित कर दिया। इसके बाद अभी तक कहीं भी भूमि नहीं दी गई। जबकि लूम संचालक कई बार इसकी मांग कर चुके हैं। अभी मामला शासन स्तर पर अटका है। 

सूती वस्त्र निर्माण  ही रहा आधार
जबलपुर में आजादी के समय से पावरलूम चलते थे। पहले यह काम हथकरघा से होता था। इन पर सूती कपड़ा तैयार होता था। जानकार बताते हैं कि 1970 और 80 के दशक में यह उद्योग चरम पर था। वहीं 90 के दशक में पॉलिस्टर के आने से इस उद्योग पर बुरा असर पड़ा।

इस दौरान कई लूम बंद भी हुए। बताया जाता है कि फिर वर्ष 2000 के आसपास यहां पर बेंगलोर सिल्क साडि़यों का काम शुरू हुआ। वहीं 2005 के आसपास कान्टे्रक्ट बेस पर दरी, चादर का काम शुरू किया गया। वर्तमान में यहां सूती साडि़यां, सफेद धोती, गमछा, अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली चादर, बस्ता का कपड़ा, हरे परदे और रंग-बिरंगी दरी ही बन रही है। 

सरकार से  मिली सहायता
इस उद्योग में अब अत्याधुनिक तकनीक आ चुकी है। लेकिन जबलपुर में ज्यादातर पावरलूम अपगे्रड नहीं है। इसका कारण क्लस्टर का नहीं बनना है। जबकि केंद्र सरकार इस काम के लिए मदद भी दे चुकी है। केंद्र ने माइक्रो स्मॉल इंटरप्राइज क्लस्टर डेवलपमेंट प्रोग्राम (एमएसईसीडीपी) के तहत 14 लाख रुपए की आर्थिक सहायता भी भेजी। इसमें औद्योगिक केन्द्र विकास निगम (एकेवीएन) के माध्यम से डायग्नॉस्टिक स्टडी तैयार की गई।

इंडस्ट्री से जुड़ी नवीनतम जानकारी के लिए पावरलूम संचालकों की बैठक आयोजित की गई और करीब 80 लोगों को टे्रनिंग भी दी गई। उन्हें बुरहानपुर और अहमदाबाद तक भेजा गया। लेकिन इस ज्ञान का उपयोग नहीं हो पा रहा है। क्योंकि जिस स्तर का प्रशिक्षण उन्हें दिया गया वह क्लस्टर में बनने वाले कॉमन फैसिलिटी सेंटर (सीएफसी) में लगने वाली आधुनिक मशीनों पर उपयोग हो सकता है।
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Manish Gite Desk/Reporting
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