भारतीय संस्कृति के हुए कायल, विदेशों में रामायण से फैलाएंगे प्रकाश

  भारतीय संस्कृति के हुए कायल, विदेशों में रामायण से फैलाएंगे प्रकाश
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वल्र्ड रामायण कॉन्फ्रेंस का समापन, जग उजियारा करेंगे कॉन्फ्रेंस में आए प्रतिनिधि

जबलपुर। वल्र्ड रामायण कॉन्फ्रें स में दुनियाभर से आए विद्वान प्रतिनिधि दुनिया को अंधकार से उजाले की ओर अग्रसर करेंगे। आने वाली पीढि़यां लाभान्वित होंगी। यह उद्गार आयोजक ब्रम्हर्षि बावरा मिशन की ज्ञानेश्वरी दीदी ने कार्यक्रम के समापन सत्र में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण के माध्यम से थ्री एच (हेड, हार्ट व हैंड) की थ्योरी दी थी। आज के संदर्भ में विवेक के साथ कर्म तो कर रहे हैं, लेकिन प्रेम भाव जीवन से गायब हो गया है। समाज संवेदनाविहीन हो रहा है। समाज हृदयविहीन होने पर विध्वंसक हो जाता है। इसी से समाज में आज ढेरों विकृति आ रही हैं।

ब्रांड एम्बेसडर बनूंगा

कनाडा के विद्वान जेफ री आर्मस्ट्रांग ने कहा मेरा जन्म उस यूरोप में हुआ, जहां न्यूक्लियर बम और लोगों में घोर अवसाद है। जीवन का उद्देश्य और ज्ञान देर से मिल पाया। सभी भारतवासी  सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें मां के दूध से ही ज्ञान व संस्कार हजारों साल से मिलते आए हैं। महाभारत और रामायण की कथा संसार का सार है। सभी भारतीय ऋषि परंपरा के प्रतिनिधि हैं। मैं संस्कारधानी आकर धन्य हो गया।  मैंने यहां से जो भी सीखा दुनियाभर में उस वैदिक संस्कृति का ब्रांड एम्बेसडर बनूंगा।

रामायण से बची अस्मिता

डॉ. विनोद बाला अरुण (उपाध्यक्ष, रामायण सेंटर मॉरीशस) ने अपने उद्बोधन में कहा कि उप्र, बिहार से लोगों को ब्रिटिश हुकूमत मजूदर बनाकर ले गई थी। उन पर कोड़े बरसाते थे। भरपेट खाना नहीं मिलता था। एेसे में अस्मिता व संस्कृति को बचाना बड़ी चुनौती थी, तब रामायण ही सहारा बनी। रात में लोग इकट्ठे होकर  चौपाई, दोहा का पाठ करते थे। उनके अंदर आत्मविश्वास जागा। 1968 में मॉरीशस की आजादी के बाद तस्वीर बदली। चाचा राम गुलाम जो हिन्दू थे, देश के प्रधानमंत्री बने। रामायण का प्रभाव बढ़ा। विवि के पाठ्यक्रम में शामिल हुई। 2001 में रामायण सेंटर स्थापित हुआ। रामायण  पर शोधार्थी अब पीएचडी करते हैं। महाशिवरात्रि का पर्व देशभर में भव्यता से मनाते हैं।

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रामायण शास्वत सत्य

रामायण को उपन्यास की तरह कथा कहने वालों पर अमेरिका से आए डॉ. नीलेश ओक ने अपने शोध-पत्र के जरिए कटाक्ष किया। उन्होंने खगोलीय गणना व रामायण, महाभारत के कई प्रमाणों के जरिए ये बताया कि    रामायण का वास्तविक काल भले ही स्पष्ट न हो, इतना तय है कि वह समय 12 हजार साल से भी पहले का है। 

विश्व संस्कृति क्रांति का स्रोत

थाईलैंड की संस्कृति पर रामायण के प्रभाव का प्रो. हरिदत्त शर्मा ने सुंदर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि थाईलैंड में सेना की टुकडि़यों के नाम हनुमान व अंगद के नाम पर हैं। कला संस्कृति, स्थापत्य पर उन्होंने भारतीय संस्कृति का जबर्दस्त असर बताते हुए रामायण को विश्व संस्कृति क्रांति का स्रोत बताया। 

शुरू हुआ प्रवाह

आयोजन समिति के अध्यक्ष अजय विश्नोई ने दुनियाभर से आए विद्वानों के प्रति आभार जताते हुए कहा कॉन्फ्रेंस की सफलता पर अभिभूत हूं। ऋषि जाबालि की धरती पर यह आयोजन किया। यहां से जो प्रवाह शुरू है, वह थमना नहीं चाहिए। दुनियाभर में एेसे आयोजन हों। आचार्य कृष्णकांत चतुर्वेदी ने कहा कि एेसे ही आयोजनों के जरिए हमें भविष्य की चुनौतियों से निपटने के रास्ते ढूंढऩे होंगे। नरसिंहपुर-होशंगाबाद के सांसद राव उदय प्रताप सिंह ने कहा ये आयोजन का समापन नहीं विश्राम है। आयोजन की परंपरा जारी रहेगी। आयोजन के 11वें सत्र में थाईलैंड की डॉ. नॉन ग्लुक्साना व मौली कौशल ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

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