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सलवा जुडूम के विस्थापित कह रहे- ' कश्मीर फाइल्स ' की तरह खुले ' बस्तर फाइल्स '

मनुष्य सामाजिक प्राणी है वह समाज में अपनों के साथ रहना चाहता है यदि उसे जबरन समाज और अपनों से दूर कर दिया जाता है तो वह यह दंश आसानी से बर्दाश्त नहीं कर पाता | ऐसी ही हालत दक्षिण बस्तर में सलवा जुडूम प्रभावितों की है जिन्हें बिना किसी अपराध के उन्हें अपनों से दूर कर दिया गया है वे तेलंगाना-आंध्रप्रदेश में विस्तापित जीवन जीने विवश है वह आदिवासी है, गरीब हैं इसलिए उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है

जगदलपुर

Updated: May 22, 2022 10:08:17 am

मनीष गुप्ता
जगदलपुर । नक्सल उन्मूलन के लिए डेढ़ दशक पूर्व बस्तर में चलाया गया सलवा जुडूम अभियान आदिवासियों के लिए अभिशाप साबित हो रहा है। इस मुहिम से बस्तर नक्सल मुक्त तो हुआ नही उल्टा इसका दुष्प्रभाव उन गरीब आदिवासियों पर पड़ा जिनका सलवा-जुडूम से दूर-दूर तक कोई सम्बंध नही था। इसके चलते दक्षिण बस्तर के सुकमा,बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों के 40 हजार से अधिक आदिवासियो को अपना घर छोडऱ पड़ोसी प्रान्त तेलंगाना-आंध्रप्रदेश के जंगलों में शरण लेनी पड़ी। वे आज भी विस्थापन का दंश भोगने विवश हैं। विस्थापित होकर आंध्र और तेलंगाना गए हजारों ऐसे आदिवासी हैं जो यहां खेती-किसानी के मामले में संपन्न थे लेकिन अब वहां वे दाने-दाने को मोहताज हैं। हालांकि इन आदिवासियों के पुनर्वास के लिए अब प्रयास शुरू हुए हैं। द न्यू पीस प्रोसेस के शुभ्रांशु चौधरी बताते है विस्थापित आदिवासियों को सुरक्षित स्थान और वातावरण मिले तो वे वापस लौट सकते हैं। पिछले दिनों विस्थापित परिवार के प्रतिनिधि रायपुर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से भेंटकर उनसे उचित पहल करने का अनुरोध कर चुके हैं। उन्होंने बस्तर के आदिवासियों के पुनर्वास की तुलना कश्मीरी पंडितों से करते हुए कहा कि कश्मीर फाइल्स की तर्ज पर बस्तर फाईल्स भी खुलनी चाहिए ताकि गरीब आदिवासियों को भी न्याय मिल सके।
जब बस्तर से गए तो थी सैकड़ों एकड़ खेती वहां अब दाने-दाने को हैं मोहताज
बस्तर के 40 हजार आदिवासी पिछले डेढ़ दशक से झेल रहे विस्थापन का दर्द
तेलंगाना के 6 जिले व आंध्र के 2 जिलों में हैं बस्तर के विस्थापित
बस्तर के सबसे अधिक विस्थापित तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुड़ेम, मुलुगु और आंध्रप्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी जिले में रह रहे हैं। तेलंगाना में निवासरत आदिवासियों की संख्या लगभग 35 हजार तथा आंध्रप्रदेश में 5 हजार लोग निवासरत हैं पर वहां के अफसर उन्हें वहां भी रहने नहीं देना चाहते। आलम यह है कि दोनों प्रदेशों ने पिछले दो सालों में इनके क़ब्ज़े की बहुत सी ज़मीन इनसे वापस लेकर उस पर सरकारी पौधारोपण कर दिया है। जिसकी वजह से यह आदिवासी अब पुन: भूमिहीन हो गए हैं।
जंगल में पुनर्वास के लिए तैयार नहीं है आंध्र-तेलंगाना के अफसर
बस्तर के इन विस्थापितों को वापस लाने प्रयास किए जा रहे हैं पर यह फलीभूत नहीं हो पा रहा है। इस पर समाजसेवी शुभ्रांशु का कहना है कि जब तक इस कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ नहीं किया जाएगा तब तक इसमें अपेक्षित सफलता मिलना आसान नहीं होगा। इसमें केंद्र सरकार के साथ साथ छग,आंध्र और तेलंगाना की सरकारों को भी पहल करनी होगी। आंध्र और तेलंगाना के अधिकारी बताते हैं कि उन्हें स्पष्ट अलिखित निर्देश हैं कि इन विस्थापितों को जंगल में नहीं रहने दिया जा सकता, यह या तो छत्तीसगढ़ वापस जाएं या फिर ये हमारे शहरों में झुग्गियों में रह सकते हैं। यदि इन्हें जंगल में रहने दिया गया तो आज नहीं तो कल नक्सली आंध्र और तेलंगाना में घुसने के लिए इनका लांचिंग पैड की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।
33 परिवारों ने भोपालपटनम में लौटने की जताई मंशा
विस्थापित आदिवासियों को लेकर द न्यू पीस प्रोसेस नामक सामाजिक संस्था पिछले एक माह से विस्तृत सर्वे कर रही है। उसके मुताबिक तेलंगाना के मुलुग जिले में निवासरत 33 परिवारों ने बीजापुर जिले के भोपालपटनम में लौटने की मंशा जताई है। लगभग एक हजार लोगों ने छग सरकार को आवेदन सौपकर एफआरए की धारा 3.1 एम के तहत अपने पुनर्वास की मांग की है इसके तहत विस्थापित आदिवासी को उस राज्य में उतनी ही जमीन दी जा सकती है जितनी वह अपने राज्य में छोडक़र आया है। इस मामले में राज्य सरकार की ओर से अब तक कोई पहल नहीं हुई है।
सरकार आदिवासियों को वापस लाने गंभीर
सलवा जुडूम का मैंने विरोध किया था। जो आदिवासी बस्तर छोडक़र आंध्रप्रदेश-तेलंगाना में चले गए हैं उन्हें वापस लाने भूपेश बघेल सरकार गंभीर है। सीएम के निर्देश पर सुकमा,दंतेवाड़ा और बीजापुर से अधिकारियों के दल प्रभावितों से मिलने गए थे। अफसरों की रिपोर्ट अभी कंपाइल हो रही है। उसे सीएम के सामने पेश किया जाएगा। जो भी लोग वापस आना चाहेंगे उन्हें पूरी सुरक्षा और रहने के लिए जमीन प्रदान की जाएगी।
कवासी लखमा, प्रभारी मंत्री बस्तर

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