जानिए क्यों है प्रवीर चंद्र भंजदेव का नजरिया बस्तर के लिए प्रासंगिक

जानिए क्यों है प्रवीर चंद्र भंजदेव का नजरिया बस्तर के लिए प्रासंगिक

Ashish Gupta | Publish: Mar, 25 2016 07:21:00 PM (IST) Bastar, Chhattisgarh, India

बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की 50वीं पुण्यतिथि मनाई गई। राजमहल परिसर में राजपरिवार के सदस्यों व जनप्रतिनिधियों समेत अन्य लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

अजय श्रीवास्तव/जगदलपुर. बस्तर के वर्तमान हालात को बयान करने के लिए एक ही पंक्ति काफी है, पहले जो बस्तर लोक रंग के लिए ख्यात था, बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की असामयिक मौत के बाद वह लहु के रंग से भर गया।

राजशाही से सीधे माओवाद की ओर बस्तर के कदम इस तेजी से बढ़े की प्रशासन को भी यह मानना पड़ा है कि प्रवीर चंद्र की अनुपस्थिति की भरपाई करने शासन-प्रशासन की कोशिशें नाकामयाब रहीं।

पुलिस व माओवाद एक दूसरे के वर्चस्व को खत्म करने तुली


अब तो सीधे यहां पुलिस व माओवाद दो ही शक्तियां एक दूसरे के वर्चस्व को खत्म करने तुली हुई हैं। दोनों के बीच सबसे बड़ा नुकसान वह आदिवासी उठा रहा है जो महाराजा प्रवीर के कार्यकाल में निश्छल, निष्कपट व निष्काम सेवा का प्रतीक रहा करता था। बस्तर के आधुनिक इतिहास को प्रवीर के पहले व प्रवीर के बाद का बस्तर के तौर पर सीधे दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।

<>आई प्रवीर द आदिवासी गाड
प्रवीर चंद्र भंजदेव की बस्तर में सार्वभौमिक मौजूदगी का यह प्रमाण है कि उन्होंने अपने लिखित पुस्तक में लिखा था आई प्रवीर द आदिवासी गाड। इस एक वाक्य से उनकी आदिवासी समाज का निर्विरोध अगुवा होने का प्रमाण मिल जाता है।

प्रवीर के बाद बस्तर में राजशाही को दरकिनार रख प्रशासन ने जो भी कदम उठाए वे प्रयोगात्मक साबित हुए। आदिवासी समाज में वर्तमान में भी शासन- प्रशासन की प्रत्येक नीति को शक की निगाह से देखा जाता है।

आदिवासी समाज देवता तुल्य मानते हैं


प्रवीर को महाराजा से अधिक यहां के आदिवासी समाज देवता तुल्य मानते आए हैं। ऐसा नहीं कि प्रवीर आदिवासी समाज बल्कि बाहर से आकर बसे लोगों के लिए भी निर्विवाद व्यक्तित्व रहे हैं।

मनाई गई पुण्यतिथि


प्रवीर चंद्र भंजदेव की 50वीं पुण्यतिथि शुक्रवार को मनाई गई। राजमहल परिसर के सामने सुबह प्रवीर चंद्र भंजदेव की प्रतिमा पर राजपरिवार के सदस्यों व जनप्रतिनिधियों समेत अन्य लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर राजमाता कृष्णाकुमारी देवी, किरण देव, अरुण ठाकुर, लच्छुराम कश्यप, सुभाउ कश्यप, अजय सिंह ठाकुर व अन्य बड़ी संख्या में मौजूद थे। श्रद्धांजलि के बाद रक्तदान शिविर, स्वास्थ्य शिविर व अस्पताल में मरीजों को फल वितरण हुआ।

प्रवीर के नजरिए के बिना बस्तर का विकास संभव नहीं


पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम का कहना है कि बस्तर का विकास प्रवीर के नजरिए से ही हो सकता है। महाराजा प्रवीर की आदिवासी जनसमुदाय में पैठ, उनका सहयोगात्मक रवैया, दूरदर्शिता व सरलता के आदिवासी वर्तमान में भी कायल हैं।

सामाजिक समरसरता विश्व में अनूठा है


शांत बस्तर में महाराजा की प्रासंगिकता उनके निधन के चार दशक बाद भी जस की तस बनी हुई है इसका सबसे बड़ा उदाहरण दशहरा महापर्व है। सामाजिक समरसरता से मनाए जाने वाले 75 दिवसीय यह पर्व विश्व में अनूठा है।

महिला सशक्तिकरण के प्रणेता रहे


प्रवीर चंद्र भंजदेव यदि रहते तो निश्चित ही बस्तर का वह स्वरूप नहीं होता जैसा आज हम देख-सुन रहे हैं। वे बस्तर के समग्र उन्नति के लिए प्रयासरत थे। उन्होंने सर्व प्रथम संभाग में जिलों के पुनर्गठन की अवधारणा पर कार्य किया था। महिला सशक्तिकरण की जो बातें आज हम कर रहे हैं वैसा आंदोलन महारानी वेदवती ने दशकों पूर्व किया था।

कमलचंद्र भंजदेव, युवा आयोग अध्यक्ष व राजपरिवार सदस्य का कहना है कि वे आदिवासी महिलाओं के हितों को लेकर सड़क पर उतर आई थीं। बस्तर में स्वास्थ्य सुविधाओं की जरुरतों को भांपते महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी ने महारानी अस्पताल की नींव धरी। शिक्षा के लिए स्कूल की स्थापना उन्हीं के जीवनकाल में हुआ था।

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