छत्तीसगढ़ के किसानो पर पड़ रही जलवायु परिवर्तन की मार,बस्तर सबसे ज्यादा प्रभावित

छत्तीसगढ़ के किसानो पर पड़ रही जलवायु परिवर्तन की मार,बस्तर सबसे ज्यादा प्रभावित

Deepak Sahu | Publish: Apr, 24 2019 03:56:21 PM (IST) | Updated: Apr, 25 2019 01:37:52 PM (IST) Bastar, Jagdalpur, Chhattisgarh, India

2018 में हुए सत्ता परिवर्तन ने ये साबित कर दिया की किसानो की समस्या अब एक महत्वपूर्ण राजनितिक मुद्दा बन गया है। किसान क्रेडिट कार्ड और समर्थन मूल्य जैसी योजनाएं किसानो को तात्कालिक लाभ तो दे सकती हैं लेकिन इसके दूरगामी परिणाम नहीं मिलने वाले।

बस्तर जलवायु परिवर्तन हमारे स्वास्थ्य के साथ ही हमारे देश की अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।भारत की एक कृषि प्रधान देश है और भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है लेकिन मानसून के अनियमित होने और वर्षा के कम होने के कारण हमारे अर्थव्यवस्था का यह महत्वपूर्ण पहिया आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।

छत्तीसगढ़ मध्यभारत के उन राज्यों में से है जो जलवायु परिवर्तन के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।कृषि और उससे जुड़े क्षेत् छत्तीसगढ़ की 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के आय का जरिया होने के साथ ही राज्य के जीडीपी में 16 प्रतिशत का योगदान भी करती है।80 प्रतिशत ग्रामीणों में से लगभग 46 प्रतिशत लघु एवं सीमांत किसान है जो खेती के लिए बारिश पर ही निर्भर करते हैं और ऐसे किसानो पर ही जलवायु परिवर्तन की मार सबसे ज्यादा पड़ रही है।

छत्तीसगढ़ के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में ख़ास कर पहाड़ी इलाकों में सिचाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं है। इसके अलावा मिटटी में नमी की कमी के कारण एक सीजन में दूसरे फसल की उपज लेने की सम्भावना लगभग ना के बराबर हो जाती है जो किसानो की समस्या और बढ़ा देती है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के एग्रोनोमी विभागाध्यक्ष डॉ. जी के दास के अनुसार वार्षिक सामान्य वर्षा 1400-1600 मिलीलीटर से घटकर 1200-1400 मिलीलीटर रह गयी है। वहीं जो मानसून पहले 80 से 90 दिनों का होता था अब वह घट कर लगभग 65 दिनों का हो गया है।

बारिश के पैटर्न में परिवर्तन के कारण लगतार सूखे की समस्या उत्पन्न हो रही है। 2015 में राज्य के 27 जिलों की 117 तहसीलों,2016 में में 65 तहसीलों और 2017 में 21 जिलों के 96 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया था।पानी की खपत के अनुपात में वर्षा कम होने के कारण इस साल राज्य के कई क्षेत्रों में पहले से ही भुजल के स्तर में गिरावट देखी जा रही है और विशेषज्ञों का कहना है की परिस्थितियां और बदतर हो सकती हैं।

यूनाइटेड किंगडम के इंटरनेशनल डेवलोपमेन्ट डिपार्टमेंट ने दक्षिण एशिया में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को काम करने के लिए एक्शन ऑन टुडे क्लाइमेट प्रोग्राम के माध्यम से छत्तीसगढ़ में जलवायु परिवर्तन के कृषि पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया और उनके अध्ययन के अनुसार जलवायु में परिवर्तन के कारण कीट पतंगों की संख्या में वृद्धि हुई है जिसके कारण कीटनाशकों के प्रयोग के साथ ही ओलावृष्टि, चक्रवात और बाढ़ की घटनाओं में भी वृद्धि हुई है जिसके कारण फसलों का उत्पादन प्रभावित हुआ है।

 

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मानसून की शुरुआत में देरी के कारण भी पिछले तीन चार सालों में खरीफ की बुआई भी देरी से हुई जिसके कारण खरीफ की फसलों में मुख्यरूप से धान की फसल प्रभावित हुई क्योंकि ऐसी फसलों को परिपक्व होने में समय लगता है और देरी के कारण उन्हें अपेक्षित समय नहीं मिल पा रहा है।पिछले चार पांच सालों में खेती में नुकसान होने के कारण पलायन में वृद्धि हुई है।किसान शहरों में मजदूरी करने को मजबूर हैं। इसके अलावा, खेती में ज्यादा जोखिम और नुकसान के कारण पिछले चार से पांच वर्षों में पलायन में वृद्धि हुई है।

छत्तीसगढ़ में कृषि एवं जैव प्राद्यौगिकी विभाग किसानो की मदद के लिए सौर पम्प, एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन जैसी योजनाएं चला रही है लेकिन यह पर्याप्त नही है।आवश्यकता है की विभाग जलवायु परिवर्तन के कारणों और उससे किसानो को बचाने के संभावनाओं को तलाश करे जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सही कदम उठाये जा सकें।

छत्तीसगढ़ के दक्षिणी क्षेत्र में बस्तर मौसम आधारित फसल बीमा और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के साथ ही अन्य योजनाओं की सही जानकारी नहीं होने के कारण किसानो को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।2018 तक छत्तीसगढ़ के कृषि बजट और योजनाओं में उर्वरकों, बीजों और कृषि उपकरणों के लिए सब्सिडी की व्यवस्था की जाती थी जिससे किसानो को कम व्यवसायियों को ज्यादा लाभ मिलता था।

वर्तमान सरकार ने किसानो को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए 'नरवा, गरुवा, घुरवा, और बावड़ी' योजना शुरू की है जिसके तहत भूगर्भ जल बढ़ाने के साथ ही पशुओं के देख रेख उनके बायो प्रोडक्ट के इस्तेमाल से बायो फर्टिलाइजर और बायोगैस का निर्माण होगा जिससे किसानो को फायदा पहुंचेगा।सरकार नरवा-गरुवा-घुरवा-बाड़ी योजना के जरिये गौठान को ग्रामीण अर्थव्यस्था के मूलभूत संस्थान की तरह विकसित कर रही है।

2018 में हुए सत्ता परिवर्तन ने ये साबित कर दिया की किसानो की समस्या अब एक महत्वपूर्ण राजनितिक मुद्दा बन गया है। किसान क्रेडिट कार्ड और समर्थन मूल्य जैसी योजनाएं किसानो को तात्कालिक लाभ तो दे सकती हैं लेकिन इसके दूरगामी परिणाम नहीं मिलने वाले। ऐसे में सरकारों को बेहतर कृषि नीति बनाने पर काम करना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन की मार से किसानो को बचाया जा सके।

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