लाॅकडाउन ने छीनी मजदूरी, जिस काम को कर मजदूर कमाते थे 400, अब उसे ही फोड़ कमा रहे 50 रूपए

पूरा परिवार दो दिन में फोड रहा १० किलो, जिसके बदले मिल रहे 50 रुपए

By: Badal Dewangan

Published: 18 Apr 2020, 01:40 PM IST

जगदलपुर. कोरोना संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन की घोषणा से सबसे ज्यादा नुकसान मजदूरों को हुआ है। उनका काम पूरी तरह से बंद हो गया। अब आलम यह है कि जो मजदूर रोज का 400 से 500 रुपए कमा लेता था। वह अपने पूरे परिवार के साथ अब इमली फोडने के काम में लगा हुआ है। इसमें पूरा परिवार मिलकर हर दो दिन में 10 किलो इमली फोड़ ले लेता है। लेकिन इसके बदल में पूरे परिवार को मिल रहे मात्र ५० रुपए। इस तरह वे महीनेभर में ज्यादा से ज्यादा मेहनत कर के भी मात्र 800 से 1000 रुपए ही कमा पाए हैं। जबकि मजदूरी में यह रकम वह दो दिन में ही कमा लेते थे।

वनोपज संग्राहकों के हाथ भी तंग
जमावाड़ा के मंडूकराम का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से इनकी कमर टूट गई है। दिहाड़ी मजदूरों के काम भी बंद हो जाने से इसका सीधा असर उनके आजीविका पर पड़ा है। वहीं लॉक डाउन में हाट बाजार बंद होने से व्यापारियों पर आश्रित वनोपज संग्राहकों के हाथ भी तंग हैं। ऐसे में अभी बस्तर वासियों के लिए बस्तर की वनोंपेज इमली इन ग्रामीणों के लिये आय का साधन बनी हुई है। और इससे ग्रामीणों को थोड़ी बहुत राहत मिल पा रही है। यह लोग अब रोजी रोटी के जितने पैसे हों जाए इसलिए काम कर रहे हैं।

दो महीने का चावल मुफ्त, लेकिन अन्य सामान के लिए तो पैसे चाहिए
ग्रामीणों का कहना है कि लॉक डाउन की वजह से ग्रामीण अंचलों से आकर शहर के विभिन्न संस्थानों में मजदूरी का काम करने और घर बनाने वाले राजमिस्त्री व कुली मजदूरी का काम करने वाले ग्रामीणों को कोरोना की वजह से पिछले 1 महीने से घर में खाली बैठना पड़ रहा है। और बिना रोजगार के वे असहाय होने के साथ आर्थिक तंगी से भी जूझ रहे हैं। हालांकि भूपेश सरकार द्वारा इन्हें 2 महीने का राशन तो मुफ्त दिया गया है लेकिन राशन के अलावा घर में लगने वाले हर जरूरत सामानों के लिए उन्हें जूझना पड़ रहा है। ऐसे में इमली फोडना उनके ऐसे आपदा के समय में आजीविका का साधन बना हुआ है। और ईमली फोडने के कार्य में लगने से ग्रामीणों को थोड़ी बहुत राहत मिली है।

थोक व्यापारियों से इमली खरीदकर लाते और पूरा परिवार बीज निकालने के काम में जुटता है
ग्रामीण मंडकुराम का कहना है कि वे थोक में व्यापारियों से ईमली खरीद कर लाते है। अपने पूरे परिवार के साथ बैठकर इमली से बीज निकालने का काम करते हैं। इससे उन्हें थोड़ी बहुत आर्थिक मदद मिलती है। वे बताते हैं कि लेकिन शासन को जरूरत है की इन्हें साग सब्जी एवं अन्य जरूरत के सामान भी मुहैया कराएं। साथ ही इमली के बीज निकालने में जो ग्रामीणों को आय प्राप्त होती है उसमें थोड़ी बहुत बढ़ोतरी करें। जिससे कि ऐसे आपदा के समय ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोगों को अपनी जरूरत सामान खासकर खाने पीने की सामानों के लिए जूझना ना पड़े। वे अपने अपने परिवार का अच्छे से पालन पोषण कर सकें।

दिनभर में पूरा परिवार १० किलो इमली फोड़ता है, बदले में मिलते हैं 50 रुपए
छात्रा बबिता बताते हैं कि उन्हें 10 किलो इमली के बीज निकालने में 50 रुपए की आय होता है। इस तरह वह 10 किलो इमली से बीज निकालने में उन्हें 2 दिन का समय लगता है। इस तरह महीनेभर में उन्हें ७०० से हजार रुमप की आय हो जाती है। यह कमाई आर्थिक तंगी को दूर तो नहीं कर सकती लेकिन इससे थोड़ा बहुत जरूरी सामान वे जरूर ले पाते हैं।

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