बस्तर में माओवाद और पुलिस की जंग से डर पलायन कर गए थे ग्रामीण, लेकिन अब समाजसेवी उनके लिए करेगें ये अच्छा काम

बस्तर में माओवाद और पुलिस की जंग से डर पलायन कर गए थे ग्रामीण, लेकिन अब समाजसेवी उनके लिए करेगें ये अच्छा काम

Badal Dewangan | Publish: May, 18 2019 10:46:25 AM (IST) Jagdalpur, Jagdalpur, Chhattisgarh, India

पुलिस की माओवाद के खिलाफ लगातार चलाए जा रहे अभियानों से उनके सशस्त्र आंदोलनों से डरकर करीब १ लाख परिवार दूसरे राज्य जा बसे है।

 

जगदलपुर. बस्तर में माओवादी और पुलिस के बीच शुरू हुए सशस्त्र आंदोलन से बस्तर से करीब एक लाख आदिवासियों ने बस्तर से पलायन कर दूसरे राज्य तेलंगाना और सीमांघ्र में शरण ले ली थी। अब १५ साल बाद इन पलायन कर गए लोगों को वापस बस्तर लाने के लिए समाजसेवियों ने पहल की है।


केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय(एमओटीए) से बातचीत के बाद विस्थापित लोगों का सर्वेक्षण करना शुरू कर दिया है। वहीं सीमांध्र और तेलंगाना में रहने वाले ग्रामीणों को फार्म भराने की प्रक्रिया शुक्रवार को तेलंगाना के कृष्णासागर ब्लॉक के कोत्तागुडम से शुरू कर दी गई है। यह पहल इसलिए है क्यों कि इन्हें बस्तर वापस लाया जा सके। सरकार के इस कदम के बाद बस्तर के करीब ऐसे एक लाख आदिवासी के फिर से बस्तर में वापसी की उम्मीदें बढ़ गईं है। यह सभी 2004-05 में राज्य छोडक़र भाग गए थे।

बस्तर से पलायन कर गए लोगो की वापसी के लिए प्रयास कर रहे
समाजसेवी शुभ्रांशु चौधरी बताते हैं कि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) 2006 की धारा 3 (एम) 2006 के अनुसार, इन लोगों के भूमि अधिकारों को मान्यता दी जा सकती है। इसके तहत जो फार्म आता है, उसमें एक कॉलम होता है, जिसमे जगह की अदला बदली जैसा प्रावधान भी है। क्योंकि आदिवासियों को इसकी जानकारी नहीं थी। इसलिए जब शांति मार्च और साइकिल यात्रा निकाली गई, इसी दौरान ग्रामीणों को पता चला तो उन्होंने इस पर अपनी सहमति प्रदान कर दी। उन्होंने बताया कि यह प्रावधान पहले कभी इस्तेमाल नहीं किया गया। इसके लिए केंद्रीय मंत्रायल से बात की गई थी, उन्होंने कहा कि पहले फार्म भराए फिर इस पर कार्रवाई की जाएगी।

क्या है इन सिटू क्लॉस
इन सिटू क्लॉस का मतलब है कि अदला बदली। एफआरए के तहत अपने भूमि के अधिकार के तहत ऐसे लोग जो किसी कारण अपनी जगह छोड़ चुके हैं और वहां वापस नहीं जाना चाहते। तो ऐसे लोग एफआरए के इन सिटू क्लॉस(खंड) में दूसरी जगह जाने के लिए जमीन की मांग कर सकते हैं। वहीं सरकार ऐसे लोगों को जगह देने पर भी विचार कर सकती है। गौरतलब है कि वे लोग पहले गांव में रहते थे और माओवादी हिंसा के चलते पलायन को मजबूर हुए। अब सीमांध्र और तेलंगाना के यह लोग एफआए के इन सिटू क्लॉस का प्रयोग कर वापस किसी सेफ जगह आ सकते हैं।

सीमांध्र में १५ साल से रह रहे २४ परिवार हाल ही में लौटे बस्तर
मालूम हो कि सुकमा के मरईगुड़ा इलाके से भी सलवा जुडूम के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण पलायन कर चुके थे। लेकिन हाल ही में समाजसेवियों की मदद से १५ साल बाद यहां का २४ परिवार वापस लौटा है। इसके बाद से पलायन कर चुके लोगों को वापस लाने का प्रयास तेज हो गया है। अब केंद्र के सर्वेक्षण के बाद उम्मीद और भी बढ़ गई है।

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