देश-विदेश में ख्यातिनाम हस्तियां पहुंचेंगे दंतेवाड़ा, अपने अनुभवों व विचारों को करेंगे साझा

हरित क्रांति के अगुवा पद्मश्री डॉ स्वामीनाथन, अमेरिका से स्टीफन जॉनसन भी आएंगेे, वैश्विक आदिवासी उद्यमिता सम्मेलन में दिग्गजों का होगा जमावाड़ा।

By: ajay shrivastav

Published: 10 Nov 2017, 08:42 PM IST

दंतेवाड़ा . आगामी 14 नवंबर को जिला मुख्यालय में होने वाले वैश्विक आदिवासी उद्यमिता सम्मेलन में विश्वविख्यात हस्तियां पहुंच रही है। इनमें हरित क्रांति के अगुवा पौधों के जेनेटिक वैज्ञानिक पद्मश्री, पद्मभूषण डॉ एम स्वामीनाथन भी होंगे। तमिलनाडु के रहने वाले डॉ स्वामीनाथन देश ही नहीं बल्कि विदेशों में ख्यातिनाम हैं। वर्तमान में वे राष्ट्रीय कृषि आयोग के चेयरमेन हैं। अनेक विश्वविद्यालयों में डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित हैं। पहला विश्व खाद्य पुरुस्कार, टाइलर पुरुस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण जैसे विभिन्न उपाधि व पुरुस्कारों से समानित हैं।

भारत के गेहूं उत्पादन में भारी वृद्धि हुई
उच्च उत्पादन वाले गेहूं की प्रजाति का विकास करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले गेहूं की एक बेहतरीन किस्म को पहचाना व स्वीकार किया। इसके बाद भारत के गेहूं उत्पादन में भारी वृद्धि हुई। इन्हें भारत में हरित क्रांति का अगुवा माना जाता है। डॉ स्वामीनाथन यहां अनुभवों व विचारों को साझा करने के साथ किसानों को विभिन्न प्रकार की जानकारियां भी देंगे।

वैश्विक आदिवासी उद्यमिता सम्मेलन में देश-विदेश में ख्यातिनाम हस्तियों का होगा जमावाड़ा

अमेरिका से पहुंचेंगे स्टीफन जॉनसन
यहां सम्मेलन में अमेरिका के स्टीफन जॉनसन भी आएंगे। वे केरल में आदिवासी किसानों के लिए काम कर रहे हैं। बाढ़ व सूखे जैसी स्थिति से निपटने पर उन्होंने काम किया है। यहां उनका पहुंचना बेहद फायदेमंद होगा। इनके अलावा रश्मी तिवारी भी जाना माना नाम है। वे झारखंड में आदिवासी महिलाओं के उत्थान व उद्यमिता के लिए काम कर रही हैं। मैथ्यू जॉन तमिलनाडु में आदिवासियों के साथ 20 सालों से काम कर रहे हैं। इको डेवलपमेंट सर्विस पर भी लगातार काम करते आ रहे हैं।

दुनिया का पहला हाथी फ्रेंडली खेत बनाया
इसी सम्मेलन में बांग्लादेश से जाने माने टेंजिंग बोडोसा भी यहां आएंगे। बोडोसा असम के रहने वाले हैं। इन्होंने अपने खेत को दुनिया का पहला हाथी फ्रेंडली खेत बनाया। इनके बारे में बताया जाता है कि इन्होंने 6वीं तक पढ़ाई कर छोड़ दी। दो हेक्टेयर की जमीन में कृषि शुरू की। खेतों में हाथियों का आतंक से बचने हाथी फ्रेंडली खेत बनाया। आज सालाना 60 से 70 लाख रुपए कमा रहे हैं। इन्होंने 12 हजार आदिवासी किसानों को भी आर्गेनिक टी की खेती के लिए आत्मनिर्भर बनाने का काम किया है। हर साल करीब 100 से ज्यादा टूरिस्ट इनके खेतों को देखने पहुंचते हैं।

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