कोसारटेडा डैम के एक हजार विस्थापित किसानों को 12 साल बाद भी ना जमीन मिली ना मकान, जानिए क्यों

किसानों से खेती के लिए 5 एकड़ और रहने के लिए जमीन देने का किया था वादा, मुआवजे को लेकर भी किसानों में है नाराजगी

By: Badal Dewangan

Published: 14 Mar 2020, 12:00 PM IST

शेख तैय्यब ताहिर/जगदलपुर. बस्तर में सबसे बड़ी बांध परियोजना का सपना साकार करने के लिए बस्तर ब्लॉक के 1031 परिवारों ने अपनी पूरखों की जमीन छोड़ दी थी। जिन्होंने सरकार के सपने को पूरा करने के लिए इतना बड़ा त्याग किया सरकार उन्हें ही भूल गई। आज 12 साल बीत जाने के बाद भी सरकार ने इन किसानों से जो वादा किया था वो आज तक पूरा नहीं किया है। आलम यह है कि जो कभी कई एकड़ जमीन के स्वामी थे आज वे जिस जगह रह रहे हैं उन्हें वे अपना भी नहीं कह सकते, क्योंकि उनका घर अतिक्रमित भूमि पर है। ऐसे लोगों की संख्या एक, दो या दस बीस नहीं बल्कि 1031 परिवार सरकार की वादा खिलाफी का खामियाजा भूगत रहे हैं। ग्रामीण कहते हैं कि सरकार ने मिन्नत करते हुए उनसे कहा था कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने से जिले में पानी की समस्या दूर होगी, किसानों को सिंचाई की सुविधा भी मिलेगी। हजारों लोगों को फायदा मिलेगा। यही बात सोचकर अपना पैत्रिक जमीन सरकार को सौंप दी लेकिन शर्म की बात है कि वही सरकार अब हमें ही भूल गई है। साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार ने जो मुआवजा दिया है वह भी २० साल पुरानी कीमत पर। ऐसे में अब वे अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

खेती के लिए पांच एकड और रहने के लिए ६०० वर्गफीट जगह देने का था वादा
दरअसल किसानों के विस्थापन के समय सरकार ने किसानों से वादा किया था कि सभी परिवार को पांच एकड़ जमीन दिया जाएगा और रहने के लिए ६०० वर्गफीट की जगह भी। २००७ में उन्हें विस्थापित किया और ९ अगस्त २००८ को प्रदेश के पूर्व मुखिया डॉ. रमन सिंह ने बस्तर के सबसे बड़े बांध कोसारटेडा का लोकार्पण किया था। इस बांध के निर्माण के बाद सरकार इन किसानों को ही भूल गई। मुआवजे में भी २० साल पुराने प्लान के तहत राशि प्रदान की गई। जिसकी वजह से ग्रामीण नाराज हैं।

ग्रामीणों का छलका दर्द, कहा कभी मालिक थे सरकार ने मजदूर बना दिया
विस्थापन के बाद पखनाकोंगेरा में रह रहे परिवार के बीच जैसे ही पत्रिका की टीम पहुंची। यहां लोगों की भी भीड़ जमा हो गई और उनका दर्द छलक आया। इन सभी लोगों ने बताया कि उन्हें आज तक सरकार ने वादे के अनुरूप खेती करने व रहने के लिए जमीन नहीं दी है। उन्होंने बताया कि सरकार से लेकर प्रशासन के पास वे पहुंच चुके हैं, लेकिन आज तक मांग पूरी नहीं हुई है। उनका कहना है कि कल तक खुद की खेती हुआ करती थी, दूसरे लोग उनके यहां काम करने आते थे, लेकिन आज वे दूसरे की खेती में मजदूर बनकर काम कर रहे हैं। बदले में मिल रही दिहाड़ी से घर चल रहा है।

बरसात के तीन माह बिताया एक शेड के नीचे
गोपीराम आज भी जब उन दिनों को याद करते हैं, तो सिहर उठते हैं। उन्होंने बताया कि जब उन्हें प्रशासन ने उनकी जमीन से भगाया तो उनके पास रहने के लिए कोई जगह नहीं थी। उपर से उनके परिवार में ४२ लोग थे। किसी तरह उन्होंने मदद मांग कर शेड को बल्लियों के सहारे लटकाकर पूरे तीन माह निकाले। उन्होंने बताया कि केवल वे नहीं बल्कि उनका पूरा परिवार इसी शेड के नीचे पूरे तीन माह गुजारे।

शरीब बूढ़ा हो गया लेकिन उम्मीद नहीं
गांव वालों से बात चल ही रही थी, के इसी बीच ६५ वर्षीय अमीरनाथ कश्यप ने कहा कि उनका शरीर जरूर बूढ़ा हो चुका है कि उनकी उम्मीद नहीं। वे इसके लिए लड़ाई लड़ रहे हैं, और यह तब तक जारी रहेगी जब तक सरकार द्वारा किया गया वादा पूरा न हो जाए। रहने के लिए दी थी दलदली जमीन अमीरनाथ ने आगे कहा कि शासन, प्रशासन ने मिलकर उनकी जमीने छीन ली। इसके कुछ सालों बाद उन्होंने जो जमीन दी वह बांध से कुछ दूरी पर ही था। उन्होंने बताया कि वहां दलदली जमीन की शिकायत थी, जहां रहना नामुनकिन था। इसकी शिकायत तात्कालीन कलक्टर से भी की गई थी, और दूसरी जगह जमीन देने पर सहमति बनी थी।

घर में रह तो रहें हैं, लेकिन अपना नहीं कह सकते
धनुराम ने बताया कि जब बांध के लिए उनकी जमीन से प्रशासन ने उन्हें खदेड़ा था। तो वे पास के ही क्षेत्र सालेमेटा में रहने लगे थे। कुछ दिन बाद ही उन्होंने पूरे परिवार के श्रमदान से यह घर तैयार किया था। १० साल हो गए लेकिन आज भी इस घर को अपना नहीं कह सकते। क्योंकि इस घर के न तो कागज उनके पास हैं, और न ही अन्य कागजाद। इसलिए कभी भी हटाए जाने का डर हमेशा लगे रहता है।

फैक्ट फाइल
इन पांच गांव के 1031 परिवार हुए विस्थापित
सालेमेटा 479

घुरावंड 173
खडक़ा 70

कमेला 231
कनेरा 78

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