जहां नक्सलियों ने १० घंटे ग्रामीणों को बंधक बनाकर पीटा था, वहां पहुंचा पत्रिका, पढि़ए पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट

जहां नक्सलियों ने १० घंटे ग्रामीणों को बंधक बनाकर पीटा था, वहां पहुंचा पत्रिका, पढि़ए पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट

Badal Dewangan | Publish: Apr, 27 2019 01:56:22 PM (IST) | Updated: Apr, 27 2019 01:56:23 PM (IST) Jagdalpur, Jagdalpur, Chhattisgarh, India

पत्रिका के सामने ग्रामीणों ने जाहिर की अपनी मांगें, उस गांव से ग्राउंड रिपोर्ट जहां माओवादियों ने पिछले दिनों १० घंटे तक आदिवासियों बंधक बनाकर पीटा था - आज भी दहशत में है मुंडागढ़ निवासी, ग्रामीणों की मांग है कैंप

शेख तैय्यब ताहिर/तपन यादव जगदलपुर. संभागीय मुख्यालय से ६० किमी दूर घने जंगलों के बीच बसे मुंडागढ़ के ग्रामीणों के जेहन में १२ दिन पहले हुई मारपीट की घटना अब भी ताजा है। माओवादियों के दहशत में रह रहे इन ग्रामीणों के बीच पत्रिका की टीम पहुंची और उनकी आपबीती सुनी। ग्रामीण चाहते हैं कि सरकार गांव में कैंप खोले, वर्ना माओवादी उन्हें मार डालेंगे। माओवादी गांव के १५ लोगों की हिट लिस्ट पहले ही तैयार कर चुके हैं।


ग्रामीण गांव में मोबाइल टावर लगाने की मांग कर रहे हैं। फिलहाल यहां टावर नहीं होने की वजह से उन्हें ६ किमी दूर जाकर मोबाइल से फोन लगाना पड़ता है। यह पूरा इलाका दरभा में आता है। दरभा वही इलाका है जहां साल २०१३ में जीरम घाटी कांड हुआ और माओवादियों ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को मार डाला। इलाके में माओवादियों की समानांतर सरकार चल रही है। मुंडागढ़ में १२ दिन पहले माओवादियों की ग्रामीणों की १० घंटे तक सिर्फ इसलिए पिटाई कि क्योंकि उन्होंने मतदान में हिस्सा लिया था। इस गांव में स्कूल तो है लेकिन शिक्षक नहीं। जिन्होंने एडमिशन लिया है उन्हें कहा गया है कि बगैर परीक्षा आपको रिजल्ट दे दिया जाएगा।

कैंप खुलेगा तभी पहुंचेंगी विकास योजनाएं
१२ दिन पहले गांव में माओवादियों की मारपीट का शिकार हुए दरभा इलाके के मुंडागढ़ के ग्रामीण सरकार से पुलिस कैंप और मोबाइल नेटवर्क की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि माओवादी दहशत से निजात तभी मिलेगी जब गांव में कैंप खुलेगा। माओवादी दहशत के चलते यहां तक सरकार का विकास भी नहीं पहुंच सका है, जिसके कारण आज भी यहां सरकार की योजनाएं पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ती नजर आती है। यही कारण है कि गांव में कैंप खोलने की मांग ग्रामीण कर रहे हैं। यहां के लोग अपने आप को देश-दुनिया से कटा हुआ भी मानते हैं। उन्होनें कहा कि सडक़ आने में काफी समय लग जाएगा, इसलिए सरकार यहां पहले मोबाइल टावर लगा दे, जिससे वे मुख्यालय व दुनिया से जुड़ सकें। वहीं अपनी परेशानी और जरूरत भी एक कॉल पर प्रशासन को बता सकेंगे। गांव तक पहुंचना हो तो पगडंडियों और पथरीले रास्तों से गुजरना होगा मुंडागढ़ तक पहुंचने के लिए आज भी सडक़ नहीं है। पगड़ंडियों और पथरीले रास्तों से होकर यहां पहुचंना पड़ता है। सरकार की योजनाएं नहीं पहुंच सकी है। यहां जैसे ही पहुंचे, ग्रामीणों की आंखे एक टक हमें देखने लगी। जब हमने बताया कि हम आपनी परेशानी सुनने आए हैं, तो कैमरे से घबराए ग्रामीणों ने कहा कि अखबार में फोटो आने से माओवादी मार डालेंगे। फोटो नहीं लेने और नाम नहीं बताने की शर्त पर ग्रामीणों ने अपनी परेशानी बताई। गौरतलब है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी सुरक्षा की दृष्टि से बूथ को छिंदगूर में शिफ्ट किया गया था। साथ ही मालूम हो कि यह वही इलाका जहां, तीन जनप्रतिनिधियों को माओवादी पिछले चार साल में मार चुके हैं।


पुलिस की आमद थमते ही माओवादी हुए सक्रिय
ग्रामीणों का कहना है कि कोलेंग में कैंप खुलने के बाद उनके इलाके में सर्चिंग के लिए जवान लगातार आते थे। इसलिए माओवादी यहां से लगभग गायब हो गए थे। लेकिन पिछले आठ महीने में पुलिस पार्टी की सर्चिंग उनके इलाकों में काफी कम हुई है। इसे देखते हुए ही माओवादियों के हौसले बुलंद हुए और उनकी आमद गांव में बढ़ गई। पहले जहां इलाके में महीनों तक माओवादी नहीं पहुंचते थे। वहीं अब जब चाहे तब पहुंच जाते हैं। जैसे-जैसे पुलिस की आमद कम होते गई माओवादियों का गांवों में दखल बढ़ता गया। अब तो वे गांव में लोगों को बंधक बनाकर मारपीट भी करते हैं।

पहले प्रशासन का खुलकर किया समर्थन, अब यही बन गई मुसीबत
ग्रामीणों का कहना है कि उनके इलाके में जब प्रशासन पहुंचा तो उन्हें विकास का मतलब समझ आया। इस बीच धीरे-धीरे माओवादियों का खौफ भी कम हुआ। यही कारण था कि उन्होंने प्रशासन का माओवादी खौफ के बाद भी खुलकर स्वागत किया। पुलिस ने भी इलाके में लगातार मुस्तैदी दिखाई जिससे माओवादी दहशत कम हुई। लेकिन अचानक जवानों व प्रशासन की टीम की इलाके में आमद कम होने से माओवादी एक बार फिर इलाके में आसानी से पहुंचने लगे हैं, और पुरानी बातों को लेकर मारपीट कर रहे हैं। उनका प्रशासन व शासन की योजनाओं का समर्थन करना ही अब उनकी मुसीबत बन गया है।

कभी कभार ही खुलता है स्कूल
मुंडागढ़ के खासपारा में शासकीय स्कूलों के दो भवन नजर आए। एक प्राथमिक शाला, जिसकी स्थिति काफी अच्छी थी। वहीं दूसरी माध्यमिक शाला, यह कोलेंग का संकुल केंद्र भी है जिसकी हालत काफी खराब हो चुकी है। देखकर लग रहा था कि लंबे समय से यह बंद पड़े हैं। पूछने पर गांव वालों ने बताया कि स्कूल भी कभी कभार ही खुलता है। अभी तो दो से तीन महीने से स्कूल खुला ही नहीं है।

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