बस्तर में महाप्रभु को साक्षी मान 611 सालों से भेजा जा रहा है फ्रेंड रिक्वेस्ट, ये होते हैं दोस्ती के पासवर्ड

बस्तर में महाप्रभु को साक्षी मान 611 सालों से भेजा जा रहा है फ्रेंड रिक्वेस्ट, ये होते हैं दोस्ती के पासवर्ड

Badal Dewangan | Updated: 11 Jul 2019, 05:20:39 PM (IST) Jagdalpur, Jagdalpur, Chhattisgarh, India

दोस्त बनाने के लिए आमंत्रित व्यक्ति चावल के दानों का आदान- प्रदान करते हैं इसे संकल्पित मैत्री का प्रतीक माना जाता है, महाप्रभु को साक्षी मानकर फ्रेंड रिक्वेस्ट की 611 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम

अजय श्रीवास्तव/जगदलपुर. फेसबुक, इंस्टाग्राम, मैसेंजर जैसे सोशल मीडिया में दोस्त बनाने फै्रंड रिक्वेस्ट भेजे जाने की शुरुआत भले ही कुछ समय से है पर बस्तर में इसका चलन ६११ साल से जारी है। आदिवासी बाहुल्य बस्तर में गोंचा पर्व पर दोस्ती या मीत बनाने पहले रिक्वेस्ट या आमंत्रण भेजा जाता है। चावल के दानों का रिक्वेस्ट के तौर आदान-प्रदान हुआ कि दोस्ती कायम।

मजेदार बात यह है कि रिक्वेस्ट भेजने गोंचा जैसे शुभ मुहुर्त की प्रतीक्षा साल भर पहले से की जाती रही है। नए नए नीतू पांडे, नेहा और ऋतु ने बताया कि इस परंपरा को हम अपनी पीढ़ी में भी निभा रहे हैं। गोंचा का इंतजार भी कर रहे थे। इन तीनों ने सिरहासार भवन में एक दूसरे को गजामूंग का प्रसाद देकर आजीवन मैत्री का संकल्प लिया। और हमेशा दोस्ती निभाने का वादा भी किया। ग्रामीण परिवेश के जनजीवन में यह परंपरा खासी लोकप्रिय है।

Read More : पूरे भारत में कहीं नहीं होती ऐसी परंपरा जो सिर्फ बस्तर में निभाई जाती है, जानिए गोंचा का पूरा इतिहास

शादी का न्यौता सिर में हल्दी डालकर देते हैं
दूरस्थ अंचलों में बसने वाले ग्रामीण गोंचा के उत्सव में अपने सगे संबंधियों से हाल-चाल, सुख-दुख जानने उत्सुक होते हैं। कहीं खुशी का समाचार सुनकर खुश होते हैं तो वहीं किसी की मृत्यु का समाचार सुनकर रोते हैं। इस दौरान शादी का समाचार रिश्तेदारों के सिर में हल्दी डालकर दिया जाता है। बस्तर के पर्व-समारोहों में आदिवासियों के संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

प्रतीक चिन्ह को बनाते हैं दोस्ती का पासवर्ड
सोशल मीडिया की तर्ज में दोस्ती का पासवर्ड भी इस परंपरा में कायम है। दोस्ती के इस संबंध को कायम करने के बाद इस परंपरा को मानने वालेे अपने मीत का नाम न लेकर इन्हेंं गजामूंग, बालीफूल, भोजली, केवंरा, कनेर, तुलसी दल, गंगाजल, महापरसाद, मोंगरा, चंपा, गोंदा, दौनाफूल, जोगी लट, सातधार, मीत-मितान, सखी, जंवारा कहकर पुकारते हैं। इन संबंधों में फू लों के नाम को अधिक तरजीह दी गई है।

लोकगीतों में भी है इसका वर्णन
जगन्नाथपुरी में भगवान जगन्नाथ के भोग प्रसाद जिसे ‘महाप्रसाद’ कहा जाता है, चावल के सूखे दानों को भी मैत्री संबंध स्थापित करने के लिए आदान-प्रदान करते हुए ‘महापरसाद’ संबोधन से उच्चारण किया जाता है। इसी तरह बस्तर में आयोजित होने वाले गोंचा पर्व पर भी भगवान को साक्षी मानकर ‘गजामूंग’ बदने का भी प्रचलन है। लोक जीवन में इस प्रकार के संबोधन की एक लंबी श्रृंखला बन जाती है और यही नही इस संबोधन का महत्व इतना प्रगाढ़ होता है कि ग्रामीण परिवेश के लोकगीतों में भी इसका वर्णन है। यह परंपरा आरण्यक ब्राह्मण समाज के लागों में भी विद्यमान है।

आयोजन, स्थान निश्चित कर बनाते हैं मीत
गोंचा पर्व की रथयात्रा के लेखक रुद्र नारायण पाणिग्राही ने बताया कि, बस्तर की लोक परंपरा के अलावा छत्तीसगढ़ में भी मैत्री भाव की परंपरा बहुतायत में पाया जाता है। इसमें विशेष आयोजन, स्थान को निश्चित किया जाता है जहांँ आमंत्रित व्यक्तियों के बीच संकल्पित मैत्री प्रतीक का आदान-प्रदान करते हुए मैत्री संबंध स्थापित किए जाते हैं।

बस्तर की Jagannath Rath Yatra से जुड़ी खबरें पढऩे के लिए यहां CLICK करें

MP/CG लाइव टीवी

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned