निजी स्कूलों के फीस पर अभिभावकों को SC से राहत, स्कूल फीस पर 15 फीसदी की छूट


2020-21 की फीस 2019-20 से 15% होगी कम
मार्च से अगस्त के बीच जमा हो रही फीस में होगी समायोजित
छह किश्तों में जमा हो रही फीस में होगी समायोजित
गत वर्ष 10 से 20% तक बढ़ी हुई फीस भी नहीं देनी होगी
ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट ने फीस एक्ट 2016 को सही माना
वर्तमान फीस भी एक्ट के अनुसार तय 2019-20 के अनुसार फीस वसूलने का आदेश दिया

By: Rakhi Hajela

Updated: 03 May 2021, 06:03 PM IST


जयपुर, 3 मई
दो महीने 15 दिनों के लंबे अंतराल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्कूल फीस को लेकर अपना अंतिम फैसला दे दिया, फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अभिभावकों को राहत देते हुए फीस एक्ट 2016 को सही मानते हुए स्कूलों को आदेश दिया है कि जिन स्कूलों ने सत्र 2019-20 की फीस एक्ट 2016 के अनुसार निर्धारित की थी वह अभिभावकों 15 फीसदी छूट देकर सत्र 2020-21 की 85 फीसदी फीस ले सकेंगे। इस फीस का भुगतान 5 अगस्त तक 6 समान किश्तों में पूर्व अंतरिम आदेशों के मुताबिक करना होगा। स्कूल चाहे तो 15 फीसदी के अतिरिक्त छूट देना चाहे तो वह दे सकेगा। स्कूल मैनजमेंट किसी भी छात्र को ऑनलाइन क्लास या ऑफलाइन कक्षा से फीस ना चुकाने के अभाव में निकाल नहीं सकेंगे, ना ही रिजल्ट रोका जाएगा एवं कक्षा 10 वीं और 12 वीं के छात्रों का परिणाम भी फीस के अभाव में नही रोक सकते हैं। अभिभावकों या विद्यार्थियों से अंडर टेकिंग लेकर एग्जाम देने दिया जाएगा और रिजल्ट भी जारी किया जाएगा।
85 फीसदी फीस वसूलने के निर्णय पर पूर्ण विचार याचिका करेंगे दायर
प्रदेशाध्यक्ष अरविंद अग्रवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अभिभावकों को निर्णय द्वारा 2016 फीस एक्ट को सही मानकर उसे लागू कर दिया है जिससे अभिभावकों क़ो राहत मिलेगी और स्कूलों की मनमानियों पर लगाम लगेगी। जहां तक फीस के सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट ने के आदेश के दिया है वह फीस एक्ट के अनुसार फीस लिए जाने पर अभिभावकों को राहत प्रदान की है किंतु फीस एक्ट 2016 आज तक प्रदेश के स्कूलों द्वारा सही तरीक़े से लागू नहीं किया है। इस कारण 2019-20 को आधार बनाकर 15 फीसदी छूट देना जायज नहीं है । संयुक्त अभिभावक संघ इस में निर्णय की पूर्ण विवेचना करने के बाद अभिभावकों के लिए पुन: न्यायालय के द्वार खटखटाएगा।

सवाल अब भी बरकरार ?
संयुक्त अभिभावक संघ प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि देश की सर्वोच्च्य न्यायपालिका से आशा लगाए बैठे अभिभावकों निराशा हाथ लगी। १५ फीसदी की छूट देकर वर्तमान में कोरोना की दूसरी लहर के चपेट में आए असंख्य अभिभावकों के साथ दोहरी मार हुई है। १५ फीसदी से अधिक अभिभावकों ने स्कूलों के ऑनलाइन पढ़ाई के लिए संसाधनों में खर्च कर दिया जबकि ऑफलाइन कक्षा में सारी व्यवस्थाएं स्कूल संचालक करके देते थे लेकिन ऑफलाइन कक्षा ने सारे संसाधन अभिभावकों को जुटाने पड़े, जबकि किसी भी बच्चे ने पूरे सत्र में एक दिन भी भवन,टेबल, कुर्सी, कम्प्यूटर, खेल मैदान आदि का उपयोग ही नहीं किया तो वह उसकी फीस क्यो देगा। उन बच्चों और अभिभावकों का क्या होगा जिन्होंने पूरे सत्र में एक दिन भी क्लास नहीं ली है , उस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति बिल्कुल भी स्पष्ट नहीं की है। जिन स्कूलों ने 8 फरवरी को दिए अंतरिम आदेश की अवमानना की है उन स्कूलों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्णय नहीं दिया और ना ही ऑर्डर में यह बताया गया है कि जो आदेश दिया गया है उसकी अनुपालना करवाने की जिम्मेदारी किसकी होगी और अगर कोई स्कूल इस आदेश की भी अवमानना करता है तो उस पर क्या कार्यवाही होगी।

Rakhi Hajela Desk
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