1848 में पहला बालिका विद्यालय खोला, तो लोगों ने फेंका गोबर

देश की एक क्रांतिकारी महिला सावित्री बाई फूले के जन्मदिन के अवसर पर आपको बताते हैं, उनके उन संघर्षों के बारे में, जो उन्होंने समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए किए। समाज से बहिष्कार तक उन्हें झेलना पड़ा, लेकिन वे महिला शिक्षा की आजादी की अलख लेकर निकल पड़ी थीं। उन्हीं को आज पूरा देश याद कर रहा है और बच्चियों ने उन्हें कैसे क्रांतिकारी सलाम भेजा, वो भी देखते हैं।

By: Tasneem Khan

Published: 03 Jan 2020, 06:50 PM IST

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर। दिल्ली में ये इंकलाबी नारे उस जुनूनी महिला की याद में लगाए जा रहे हैं, जिन्होंने 1897 में दुनिया को अलविदा कह दिया था। लेकिन आज भी बच्चियां अपनी शिक्षा की नींव रखने वाली सावित्री बाई फुले की शिक्षा वाली आजादी को याद कर रही हैं। वे जानती हैं कि महिला शिक्षा का जोखिम दो सदी पहले सावित्री बाई फुले ने नहीं उठाया होता तो आज भी उन्हें महिला शिक्षा के लिए लड़ना ही पड़ता। आज देश की उसी पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले का जन्मदिवस है। 3 जनवरी 1831 में उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ था और पुणे में उनकी शादी महान समाजसुधाकर ज्योतिबा फुले से 1840 में हुई। इसके बाद ज्योतिबा फुले ने उन्हें पढ़ाया और समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के आंदोलन की दोनों ने मिलकर शुरुआत की। आपको बता दें कि देश का पहला गल्र्स स्कूल पुणे में स्थानीय निवासी उस्मान शेख के घर खोला गया। उनकी बहन फातिमा शेख और सावित्री बाई फुले ने इस स्कूल की नींव रखी। इसमें पहले बैच में नौ लड़कियों को इन दोनों ने पढ़ाने का बीड़ा उठाया।
भारतीय सामाजिक आंदोलन की यह एक बड़ी घटना थी। समाज के लोग इस कदम से परेशान थे कि लड़कियां कैसे पढ़ सकती हैं? बालिका स्कूल को एक पाप की तरह देखा जाता था। इसीलिए कई तरह से सावित्री बाई फुले की राह मुश्किल करने की कोशिश भी की गई। वो घर से स्कूल की ओर निकलती तो रास्ते में घरों में से उन पर गोबर फेंक दिया जाता। इसीलिए वे अपने थैले में एक साड़ी लेकर चलती थी। ताकि स्कूल पहुंचकर गोबर सनी साड़ी उतारकर बदला जा सके। उन्होंने न सिर्फ स्त्री शिक्षा की बात की, बल्कि स्त्री अधिकारों के लिए उल्लेखनीय काम किया। इसके लिए वे कविताओं का सहारा लेती थीं। इसीलिए उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है।
उनकी एक संगीत नाटिका का अंश इस तरह है...

सुनो सुनो बालिकाओं
पहला काम है तुम्हारा
पढ़ना—लिखना शिक्षा पाकर ज्ञान बढ़ाना
बाद उसके फिर खेलना—कूदना
वक्त मिले जरा तो मां का हाथ बंटाओ गृहकार्य में
परंतु सबसे पहले शिक्षा

कुछ यों सावित्रीबाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया। जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना। इस तरह वो देश के लिए एक क्रांतिकारी महानायिका रही हैं, आज भी देश की बेटियां उन्हें क्रांतिकारी तरह से याद कर रही हैं। दिल्ली के मंडी हाउस में उनके जन्मदिन पर लीड करती लड़कियों ने रैली इस अंदाज में निकाली

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