धनी व विकसित एससी-एसटी ही रोक रहे हैं जरुरतमंद का फायदा,सूची पर हो पुन:विचार—सुप्रीम कोर्ट

(Supreme court )सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि (SC ST) एससी और एसटी के (Affluent ) धनी और (Advanced) विकसित हो चुके लोग ही एससी एसटी आरक्षण का (Benefit) फायदा (Needy) जरुरतमंदों को नहीं लेने दे रहे हैं इसलिए सरकार को (SC ST) एससी व एसटी की (List) सूची पर (revised) पुन:विचार करना चाहिए।

By: Mukesh Sharma

Published: 23 Apr 2020, 09:13 PM IST

जयपुर
(Supreme court )सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि (SC ST) एससी और एसटी के (Affluent ) धनी और (Advanced) विकसित हो चुके लोग ही एससी एसटी आरक्षण का (Benefit) फायदा (Needy) जरुरतमंदों को नहीं लेने दे रहे हैं इसलिए सरकार को (SC ST) एससी व एसटी की (List) सूची पर (revised) पुन:विचार करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधानिक बैंच ने यह विचार तत्कालीन आंध्रप्रदेश में शिडयूल एरिया में 100 फीसदी आरक्षण देने को असंविधानिक घोषित करने वाले फैसले में व्यक्त किए हैं।
बैंच का नेतृत्व करने वाले जस्टिस अरुण मिश्रा ने फैसले में इंदिरा साहनी फैसले का उल्लेख करते हुए कहा है कि एससी—एसटी आरक्षण की सूची कभी नहीं बदले जाने वाली पवित्र नहीं है। कोर्ट ने यूनियन आॅफ इंडिया और राकेश कुमार के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा है कि सकारात्मक तरीकों पर समय के साथ पुर्नविचार होते रहना चाहिए और आर्थिक व सामाजिक हालात के अनुसार इनमें बदलाव होना चाहिए।
आरक्षित वर्ग में ही हो रहा है असंतोष—
बैंच ने कहा है कि अब एससी एसटी वर्ग में ही एक धनी तथा सामाजिक और आर्थिक तौर पर विकसित वर्ग बन गया है और अब आरक्षित वर्ग में ही असंतोष हो रहा है। एससी एसटी के एक वर्ग का कहना है कि उन्हें अब तक आरक्षित वर्ग का कोई फायदा नहीं मिला है क्यों कि धनी और विकसित वर्ग आरक्षण को निचले स्तर पर पहुंचने ही नहीं देता। इसलिए आरक्षण के फायदों की पात्रता को लेकर एससी एसटी और ओबीसी वर्ग में आंतरिम संघर्ष हो रहा है।
फायदा हडपने वालों को रोकना होगा—
बैंच ने आरक्षण का फायदा ले चुके वर्ग के वंचितों के हक को हडपने से रोकने के लिए आरक्षित वर्ग की सूची को संशोधित किए जाने की दलील से सहमति जताई है। बैंच ने कहा है कि सरकार यह काम आरक्षण प्रतिशत को छेडे बिना भी कर सकती है। ताकि पिछले 70 साल से या आरक्षित वर्ग में आने के बाद से आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक और सामाजिक तौर पर विकसित हो चुके लोग आरक्षित वर्ग के जरुरतमंदों के अधिकार नहीं हडप सकें। सरकार इंदिरा साहनी फैसले और संविधानिक तौर पर ऐसा करने के लिए बाध्य है और उसे इस संबंध में उचित कदम उठाने चाहिएं।
बैंच ने इंदिरा साहनी फैसले के आधार पर कहा है कि ऐसे भी कई मामले हैं जहां राज्यों में नियुक्त आयोगों ने आरक्षित सूची में कई जातियों,समाज और वर्ग को हटाने या शामिल करने की सिफारिश की हों। इसलिए ऐसी राज्य सरकारों को ऐसी रिपोर्ट पर तत्काल कार्यवाही करनी चाहिए और जातियों को हटाने या शामिल करने की सूचना तत्काल केन्द्र सरकार को देनी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि बैंच ने शिडयूल एरिया में 100 फीसदी आरक्षण देने को अन्यायपूर्ण और अतार्किक बताते हुए कहा है कि इससे एससी और ओबीसी को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। क्यों कि आरक्षण का विचार समुचित है ना कि आनुपातिक। इसलिए 100 फीसदी आरक्षण देना संविधान के अनुव्छेद—14,15 और 16 के विपरीत है। इससे उस एरिया में 1950 के बाद बसने वाले सामान्य और एसटी वर्ग के साथ भी अन्याय होगा। आंध्रप्रदेश में एसटी का कुल आरक्षण 6 फीसदी था और शिडयूल एरिया में इसे बढाकर 100 फीसदी करने से शिडयूल एरिया के बाहर के रहने वाले एसटी वर्ग के अधिकार भी प्रभावित होते हैं। क्यों कि अनुच्छेद 371डी के तहत राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार ऐसे लोग दूसरे एरिया में अधिकार नहीं मांग सकते और शिडयूल एरिया में 100 फीसदी आरक्षण देने के लिए दूसरे एरिया के पदों को भी कम करना होगा।
दूसरी बैंच एससी—एसटी में क्रीमीलेयर लागू करने को कह चुकी है..
2018 में तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा,जस्टिस कुरियर जोसफ,जस्टिस आर.एफ.नरीमन,जस्टिस एस.के.कौल और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की संविधानिक बैंच जरनैल सिंह के मामले में एससी एसटी वर्ग में क्रीमी लेयर सिद्वांत लागू करने को कह चुकी है।
इस मामले में बैंच ने एसी एसटी में क्रीमीलेयर लागू करने को सही मानते हुए कहा था कि यदि क्रीमीलेयर ही पब्लिक सैक्टर में सभी लाभ लेकर स्वयं को अनवरत बनाए रखेगी तो इससे उनके वर्ग के हमेश से पिछले रहे लोग पिछडे ही रह जाएंगे।

संविधानिक कोर्ट को अधिकार है कि...
बैंच ने कहा था कि संविधानिक अदालतों को आरक्षण के सिद्वांत को लागू करते समय अनुच्छेद 14 व 16 के तहत समानता के सिद्वांत को लागू करते हुए ऐसे ग्रुप या सब ग्रुप से क्रीमी लेयर को बाहर करने न्यायिक शक्तियां हैं।
इसके साथ ही बैंच का कहना था कि अनुच्छेद 14 और 16 के साथ अनुच्छेद 341 और 342 की सद्भभावी व्याख्या करने से साफ है कि संसद को तथ्यों के आधार पर राष्ट्रपति की सूची में से नाम हटाने या शामिल करने की पूरी आजादी है। सुप्रीम कोर्ट ने एम.नागराज मामले में भी इस तथ्य को माना था और क्रीमीलेयर सिद्वांत लागू करने के आधार पर नागराज फैसले पर पुर्नविचार करने की आवश्यकता से इनकार कर दिया था।
लार्जर बैंच केा करना है विचार...
वर्तमान में क्रीमीलेयर केवल ओबीसी आरक्षण में ही लागू होता है। दिसंबर 2019 में केन्द्र सरकार ने जैरनल सिंह मामले में पुर्नविचार के लिए लार्जर बैंच गठित करने का आग्रह किया था। क्यों कि केन्द्र सरकार की ओर से एटार्नी जनरल के.के.वेणुगोपाल ने कोर्ट को कहा था कि क्रीमी लेयर का सिद्वांत एससी व एसटी आरक्षण में लागू नहीं हो सकता। हालांकि अभी तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हुई है और सीजेआई ने लार्जर बैंच गठित नहीं की है।

Mukesh Sharma
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