Union Budget 2019: बजट से जुड़ी वो सभी बातें जो आप जानना चाहते हो

kamlesh sharma | Updated: 04 Jul 2019, 09:48:50 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

Union Budget 2019: पुरानी फ्रेंच में बोरे या थैले को बौजैट कहा जाता था और ब्रिटेन में चमड़े के थैले या बोरे में से वित्तीय प्रस्ताव को निकाला जाता था। इसलिए उस व्यंग्य में बोरे के खोलने पर व्यंग्य किया गया था बाद में यही शब्द और वह चमड़े का थैला जो कि अब लाल रंग के ब्रीफकेस के रूप में देखा जाता है, एक परम्परा बन गया।

जयपुर। Union Budget 2019: जून का अंतिम सप्ताह और जुलाई का महीना आता है तो बात होती है मानसून ( Monsoon ) की। हर तरफ यही चर्चा रहती है कब बरसात होगी। कब धरती की प्यास बुझेगी। लेकिन इस बार मानसून की चर्चा तो है ही लेकिन साथ ही एक और चर्चा भी है और वह है बजट की। आम तौर फरवरी मार्च के महीनों में चर्चा में रहने वाला यह बजट इस बार देश में चुनावों के चलते जुलाई में आ रहा है। केन्द्र सरकार की ओर केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ( Nirmala Sitharaman ) 5 जुलाई को संसद में बजट पेश करेंगी तो राजस्थान में भी बजट के चर्चे हैं और राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ( Ashok Gehlot ) 10 जुलाई को बजट पेश करेंगे।

बजट में क्या आएगा और क्या होगा ( union budget 2019 expectations ) यह तो जब बजट आएगा तब ही पता चल पाएगा लेकिन जरा आज एक बार चर्चा कर लें कि दरअसल यह बजट है क्या। तो साहब यह बजट वह दस्तावेज है जिस पर विधायिका यानी संसद या विधानसभाएं अपनी मुहर लगा कर कार्यपालिका यानी केन्द्र व राज्य सरकारों को एक वित्तीय वर्ष में पैसा इकट्ठा करने और पैसा खर्च करने के तरीकों की अनुमति देते हैं।

अब यह जानना भी दिलचस्प है कि पैसा इकट्ठा करने और फिर उस पैसे को खर्च करने के इस दस्तावेज को आखिर बजट कहा क्यों जाता है। दरअसल इस तरह के वित्तीय प्रस्ताव को यह नाम एक व्यंग्य रचना के जरिए मिला। दरअसल 1721 में सर राबर्ट वालपोल ने ब्रिटेन में प्रभाव में आए और उन्हें ब्रिटेन का प्रथम डिफेक्टो प्रधानमंत्री कहा जाता है। वे ब्रिटेन के सबसे लम्बे समय यानी बीस साल तक प्रधानमंत्री रहे। उस समय उनके एक वित्तीय प्रस्ताव पर व्यंग्य करते हुए ओपनिंग द बजट नामक रचना में वित्तीय प्रस्ताव के लिए पहली बार बजट शब्द का इस्तेमाल हुआ।

पुरानी फ्रेंच में बोरे या थैले को बौजैट कहा जाता था और ब्रिटेन में चमड़े के थैले या बोरे में से वित्तीय प्रस्ताव को निकाला जाता था। इसलिए उस व्यंग्य में बोरे के खोलने पर व्यंग्य किया गया था बाद में यही शब्द और वह चमड़े का थैला जो कि अब लाल रंग के ब्रीफकेस के रूप में देखा जाता है, एक परम्परा बन गया। तो जो बजट है वो दरअसल एक बोरा यानी थैला है बिल्कुल वैसा ही जैसा सांता क्लॉज का थैला होता है।

जब बजट की बात करते हैं तो कुछ तकनीकी बातों में, लोगों की प्रतिक्रिया सुनते हुए आपने अक्सर यह सुना होगा की बजट संतुलित है या घाटे का बजट है। दरअसल जब वित्तीय प्रस्तावों में अनुमानित व्यय अनुमानित आय से अधिक नहीं हो तो वह ‘संतुलित बजट’ है। यानी जितना कमाया उतना खर्चा। इसी तरह अगर अनुमानित आय अनुमानित व्यय से अधिक है इसे ‘बचत का बजट’ कहते हैं। यानी कमाई ज्यादा खर्चा कम। वहीं अगर यदि अनुमानित आय अनुमानित व्यय से कम है तो इसे ‘घाटे का बजट’ कहा जाता है। यानी मतलब साफ है कमाई कम औऱ खर्चा ज्यादा।

वहीं आपको यह बताना भी रुचिकर रहेगा कि भारत, अमरीका और ब्रिटेन में जो बजट बनता है वह रोकड़ बजटिंग होती है यानी वित्त वर्ष के दौरान वास्तव में कितना व्यय और कितनी आय होने की आशा है, उस आधार पर बजट बनाया जाता है। वहीं फ्रांस व कुछ अन्य यूरोपीय देशों में मांग और देयता के आधार पर बजट बनता है जिसे ‘राजस्व बजटिंग’ कहते हैं।

इसमें वित्तीय वर्ष के बजट में एक वित्तीय वर्ष के व्यय और आय को उसका ख्याल रखे बिना जोड़ा जाता है कि उस वित्तीय वर्ष में वास्तव में खर्चे प्राप्त होंगे या नहीं। कई देशों में बहु बजट की परम्परा लागू है तो कई जगह एक बजट की। बहु बजट यानी अलग अलग विभागों का अलग अलग बजट वहीं एक बजट पूरी सरकार का बजट होता है। संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन में ‘एक बजट’ प्रणाली प्रचलित है जबकि फ्रांस, स्विट्‌जरलैंड और जर्मनी में ‘बहु बजट’।

1921 के पूर्व भारत में एक ही बजट होता था लेकिन उस समय सामान्य बजट और रेल बजट अलग अलग होते थे। 2017 में यह परम्परा खत्म कर संयुक्त बजट पेश किया गया।चलते चलते आपको यह भी बता दें कि भारत में पहली बार बजट प्रथम वायसराय लार्ड केनिंग के समय 1856 से 62 के दौरान हुआ था। जेम्स विल्सन ने 18 फरवरी 1860 को पहला ब्रिटिशकालीन बजट पेश किया था।

भारत में संविधान के अनुच्छेद एक सौ बारह व 202 के तहत एक संघीय बजट और प्रत्येक राज्य का अपना अपना बजट पेश किया जाता है। और एक बात अभी जो वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है। पर सदा यह नहीं होता था। भारत में ही 1967 से पहले वित्तीय वर्ष 10 मई से 30 अप्रैल माना जाता था।

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