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जयपुर

Rajasthan Politics: राजस्थान में क्यों फेल हुआ बीजेपी का मिशन-25, सामने आई ऐसी बड़ी जानकारी

Rajasthan Politics: सूत्रों के मुताबिक बैठक में कई नेताओं ने दर्द बयां कर कहा कि हार में अपने लोग भी बड़ा कारण रहे।

जयपुरJun 17, 2024 / 10:23 am

Rakesh Mishra

Rajasthan Politics: लोकसभा चुनाव में 11 सीटों पर हार के कारण खोजने के लिए प्रदेश भाजपा मुख्यालय में दो दिन से चल रही संगठनात्मक बैठक में आपसी कलह सबसे ज्यादा सामने आई है। हार के कारण भी गिनाए। दूसरे दिन रविवार को हुई बैठक में प्रदेशाध्यक्ष सीपी जोशी, चुनाव प्रभारी विनय सहस्त्र बुद्धे, राष्ट्रीय संगठक वी सतीश और सहप्रभारी विजया राहटकर ने भरतपुर, करौली-धौलपुर, गंगानगर और डूंगरपुर-बांसवाड़ा लोकसभा सीटों का फीडबैक लिया। भरतपुर लोकसभा की बैठक में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी मौजूद रहे।
सूत्रों के मुताबिक बैठक में कई नेताओं ने दर्द बयां कर कहा कि हार में अपने लोग भी बड़ा कारण रहे। इन नेताओं का फीडबैक भी पहले ही दे दिया गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इन नेताओं ने अंदरखाने साथ रहने का नाटक किया, लेकिन उनके समर्थकों ने पार्टी को हरवाने में दिन-रात एक कर दिया। बैठक में सामने आया कि कांग्रेस ने जिस तरह एससी-एसटी आरक्षण खत्म होने का प्रचार किया। उसका समय पर जवाब नहीं दे सके। इससे एससी-एसटी वोट का काफी नुकसान हुआ। इसके अलावा ओवर कॉन्फिडेंस भी हार का बड़ा कारण रहा। इसी प्रकार संगठन के जिन नेताओं के पास बड़े पद थे, वे भी वोट नहीं दिला सके।

पदाधिकारी हुए आमने-सामने

भरतपुर लोकसभा की बैठक में क्षेत्रीय पदाधिकारी आमने-सामने हो गए। प्रत्याशी ने कहा कि चुनाव में सामूहिक प्रयास नहीं हो सके। लोस प्रभारी व संभाग सह प्रभारी के बीच सामंजस्य नहीं रहा। टिकट मिलने के बाद 22 मंडल अध्यक्षों को बदला गया। आखिर बदलने की क्या वजह थी। इसी तरह टिकट मिलने के 24 दिन बाद लोकसभा प्रभारी को लगाया गया। इससे संगठनात्मक काम भी नहीं हो सके। बाद में सीएम भजनलाल शर्मा ने सभी से कहा कि मिलकर काम करना है। आगे भी निकाय व अन्य चुनाव हैं।

अभी कई चुनौतियां

प्रदेश चुनाव प्रभारी विनय सहस्त्र बुद्धे ने मीडिया से कहा कि पार्टी की रीति के अनुसार मंथन किया गया है। हार की जिम्मेदारी के सवाल को वे टाल गए। कहा कि पार्टी के सामने कई चुनौतियां हैं। उप चुनाव में तैयारी को लेकर भी चर्चा हुई है। फीडबैक के आधार पर कई नेताओं के नंबर घटेंगे-बढ़ेंगे। संगठन व राजनीतिक नियुक्तियों में भी असर देखने को मिलेगा। जो नेता चुनाव में पूरी तरह नहीं लगे, उनका कद कम हो सकता है। जिन्होंने मेहनत की, उन्हें पदोन्नति मिल सकती है।

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