दुआ करो बोझ न बने बुलेट ट्रेन

kamlesh sharma

Publish: Sep, 17 2017 10:12:14 (IST)

Jaipur, Rajasthan, India
दुआ करो बोझ न बने बुलेट ट्रेन

जयपुर में मेट्रो ट्रेन का दूसरा फेज शुरू करने में इतनी आनाकानी क्यों की गई? क्या मेट्रो का दूसरा चरण पूरा होगा?

जयपुर/राजेंद्र शर्मा। जयपुर में मेट्रो ट्रेन का दूसरा फेज शुरू करने में इतनी आनाकानी क्यों की गई? क्या मेट्रो का दूसरा चरण पूरा होगा? जिस दल की नजर में 10 रुपए टिकट वाला मेट्रो प्रोजेक्ट घाटे का साैदा है, उसकी दृष्टि में बुलेट ट्रेन कैसे फायदे का साैदा हुआ? जी हां, बुलेट ट्रेन के शिलान्यास के बाद जयपुर में ये सवाल आम हो गए हैं।

दरअसल, अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन नेटवर्क निर्माण कार्य का शिलान्यास होने के साथ ही इसकी उपयोगिता को लेकर बहस छिड़ गई। इस बहस में साफ हो गया कि इस प्रोजेक्ट में जहां जापान के आर्थिक और कूटनीतिक लाभ जुड़े हैं, वहीं भारत के कूटनीतिक और आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक फायदे जुड़े हैं। वैसे, एक बात तो गले उतर नहीं पा रही कि इस बुलेट ट्रेन के संचालन से ही लोन चुकता हो जाएगा। खूब चुनौतियां हैं संचालन की, फिर विमान सेवा से स्पर्धा सो अलग। कहीं यह ट्रेन नोटबंदी के बाद से लडख़ड़ा रही अर्थव्यवस्था पर बोझ न बन जाए। इस मामल में तमाम पहलुओं पर गौर करने से पहले देखते हैं प्रोजेक्ट का हालात-ए-हाज़रा।

यह है प्रोजेक्ट
यह बुलेट ट्रेन परियोजना 97 हजार 636 करोड़ रुपए लागत की है। यह ट्रेन अहमदाबाद-मुंबई के बीच चलेगी। दूरी होगी 508 किलोमीटर। जो यह टे्रन 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दो या ढाई घंटे में तय करेगी। इसका रूट 92 फीसदी एलिवेटेड होगा। यानी 468 किमी दूरी यह टे्रन जमीन से ऊपर तय करेगी।

छह फीसदी भूमिगत मार्ग से और सिर्फ दो प्रतिशत यानी दस किमी जमीन पर चलेगी। अहमदाबाद-मुंबई के बीच यूं तो दस बड़े स्टेशन आनंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोर, वापी, बोईसर, विरार, ढाणे आएंगे, लेकिन रुकेगी कहां यह पक्का नहीं है।

दावा यह है कि इससे 20 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा। इसके लिए चार हजार कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जा रही है। जहां तक टेक्नोलॉजी का सवाल है फिलहाल पूरी जापान से आएगी। भारत को क्या टेक्नोलॉजी जापान देगा, इस पर अभी धुंध है। माना यह जा रहा है कि वर्ष 2022 में बुलेट ट्रेन शुरू होने के बाद धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी भारत में आ जाएगी। भारत में इस प्रोजेक्ट कार्य इंडियन रेलवे के अंतर्गत ही नेशनल हाई स्पीड रेल कार्पोरेशन देखेगा।

इससे मुंबई-अहमदाबाद के बीच आवागमन गतिमान होगा और आर्थिक विकास होगा। साथ ही, बताया जा रहा है कि किराया विमान सेवा से कम होगा। यानी जो विमान सेवा से रोजाना मुंबई-अहमदाबाद चलते हैं उनके लिए बहुत फायदेमंद होगी, हालांकि कुछ वक्त ज्यादा लगेगा।

अन्य देशों में हाई स्पीड टे्रन
दुनिया में फिलहाल चीन, जापान, बेल्जियम, पुर्तगाल, पोलैंड, अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, दक्षिण कोरिया और ताईवान में हाई स्पीड ट्रेन का संचालन हो रहा है। ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय और अमेरिकी देशों ने ऐसी ट्रेन शुरू नहीं की है। वजह यह बताई जाती है कि नौ-दस देशों में चल रही इन ट्रेनों से होने वाले नफा-नुकसान को देखते हुए अन्य देशों ने इस प्रोजेक्ट की ओर कदम ही नहीं बढ़ाए। जहां तक विश्व में प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से अग्रणी देशों का सवाल है, उनमें प्रथम दस में से एक-दो देश ही हैं, जो बुलेट ट्रेन चला रहे हैं। जहां चल रही हैं अनुभव तब भी अच्छे नहीं हैं, जब वहां की प्रति व्यक्ति आय भारत से कई गुना ज्यादा है। जापान और चीन की बात करें तो बताया जा रहा है कि वहां यह प्रोजेक्ट सफेद हाथी साबित हो रहा है। यानी उम्मीद पर खरा नहीं उतरा।

क्यों मिला सस्ता लोन
जापान की अर्थव्यवस्था में मुद्रा की जबरदस्त अतिरिक्त नकदी तरलता (सरप्लस लिक्विडिटी) है। इससे वहां की बैंकिंग व्यवस्था 20 साल से तबाह है। आलम यह है कि जापानी सेन्ट्रल बैंक कई साल से ब्याज दर नकारात्मक यानी माइनस चल रही है। बैंक जमाराशि पर ब्याज देता नहीं, बल्कि लेता है। लोग कुछ खर्च करें तो मांग बढ़े, कहीं निवेश हो। जीडीपी में 20 साल में कोई वृद्धि नहीं हो रहा, उसका शेयर बाजार का इंडेक्स 20 साल पहले के स्तर पर वापस जाने को तरस गया है। एेसे आर्थिक संकट से निकलने के लिए पूंजीवाद के अंतिम हथियार के रूप में सैन्यीकरण और युद्ध की ओर ले जाने की नीति होती है, जबकि पिछले युद्ध की बरबादी वह भुगत चुका है। ऐसे में करीब एक लाख करोड़ की बुलेट ट्रेन की मांग आना जापान की अर्थव्यवस्था के लिए हितकर ही है। दूसरी बात, जापान इस प्रोजेक्ट के बदले में बाकी एशिया-अफ्रीका के प्रोजेक्ट में भारतीय बैंकों को साथ लेने का एग्रीमेंट कर रहा है। इधर, भारतीय बैंक जहां डूबे हुए कर्जों से पार नहीं पा सके हैंं, वहीं नए कर्ज भी नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि अर्थव्यवस्था में मांग का भारी अभाव है, जिससे नया निवेश नहीं हो रहा है। उद्योगों को बैंक कर्ज की दर पिछले साठ साल में निम्न स्तर पर जा चुकी है। ऐसे में नोटबंदी होने से बैंकों में भारी मात्रा में नकदी जमा हो चुकी है, जिससे बैंकों को ब्याज की हानि हो रही है। खुद रिजर्व बैंक भारी घाटा उठा चुका है।

लोन चुकता कैसे होगा
जापान से बुलेट ट्रेन के लिए जो कर्ज लिया जा रहा है, उसे कौन और कैसे चुकाएगा, यह भी बड़ा सवाल है। हालांकि ऋण रेल मंत्रालय नहीं ले रहा, हाई स्पीड रेल अथॉरिटी ले रहा है। सीधी-सी गणित है, भारतीय रेल सरकारी है। हाई स्पीड रेल अथॉरिटी कोई निजी संस्था नहीं, रेल मंत्रालय की प्रवर्तित इकाई है। सरकार ने उसके ऋण पर की गारंटी दे रखी है। इसलिए यदि बुलेट ट्रेन से आवक के सपने साकार नहीं हुए तो, यह लोन सरकार को ही चुकाना पड़ेगा, जो सीधे जनता की जेब से टैक्स के रूप में वसूली गई राशि ही होगी। इस बुलेट ट्रेन से पूरी कमाई के लिए बहुत मशक्कत करनी होगी, क्योंकि हजारों में किराया आम आदमी तो क्या मध्यम वर्ग भी नहीं कर पाएगा, मतलब इस प्रोजेक्ट की सफलता सीधे से उच्च वर्ग पर निर्भर है।

क्या हो सकता है भाड़ा
करीब पांच साल बाद चलने वाली यह बुलेट ट्रेन करीब 300 किमी प्रति घंटे की रफ्तार के कारण अहमदाबाद से कोई ढाई तीन घंटे में मुंबई पहुंच जाएगी। बुलेट ट्रेन के पक्षधर जहां इस ट्रेन का अनुमानित किराया तीन से पांच हजार बताते हैं। वहीं विशेषज्ञों की राय दीगर है। जानकार कहते हैं जापान में एक घंटे का किराया 100 डालर यानी 4751 रुपए है। इस आधार पर देखें तो अहमदाबाद से मुंबई के बीच दो घंटे से ज्यादा के सफर का किराया 12-13 हजार रुपए से कम में नहीं होगा।

अब पेईंग कैपसिटी देखें तो जापान में जहां प्रति व्यक्ति आय 32 लाख से ज्यादा है, वहीं भारत में वर्तमान में करीब 96 हजार रुपए है। अंतर है 32 गुना से ज्यादा। ऐसे में यह सोचने वाली बात है कि क्या भारतीय इस एक तरफ की यात्रा का 12-13 हजार रुपए दे सकते हैं। रही बात विमान किराए की तो मुंबई-अहमदाबाद का किराया विभिन्न फ्लाइट्स में डेढ़ से ढाई हजार तक है। बताएं, ऐसे में कोई उद्योग पति भी विमान से एक घंटे कम समय में इतने कम किराए में यह सफर कर सकता है तो क्यों जाएगा बुलेट ट्रेन में!
एक दिन में सौ फेरे का सुझाव

देश के सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन संस्थान आईआईएम-ए की रिपोर्ट के अनुसार जो बुलेट ट्रेन के लिए जो लोन लिया गया है उसे चुकता करने के लिए यदि रेलवे ऑपरेशन के पंद्रह वर्ष बाद (16वें वर्ष से लोन वसूली) डेढ़ हजार रुपए प्रति व्यक्ति किराया करे, तो उसे प्रतिदिन 88 हजार से एक लाख 10 हजार यात्रियों को यात्रा करवानी होगी। यानी प्रतिदिन कम से कम एक सौ फेरे करने होंगे। बुलेट ट्रेन समर्थक विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन के पांच साल बाद किराया करीब तीन हजार हो जाएगा। इसका मतलब पंद्रह साल बाद बढ़ेगा या घटेगा! बढ़ेगा तो कैसे लोन चुकता होगा और घटेगा या आईआईएम के सुझाव के मुताबिक चलेंगे। चलेंगे तो डेढ़ हजार किराया में एक लाख से ज्यादा यात्री रोजाना मिलेंगे? या तीन हजार करेंगे तो रोजाना कम से कम 50 हजार यात्री मिलेंगे? और उसमें भी तब तक पुरानी हो चुकी बुलेट ट्रेन प्रतिदिन 50 से 100 फेरे करेगी। ट्रेन समर्थक यह भी तर्क देते हैं कि टे्रन आनंद, वडोदरा, भरूच, सूरत, बिलिमोर, वापी इत्यादि स्थानों पर ठहराव देने पर वहां के यात्री मिलेंगे। तो, क्या लोकल करेंगे बुलेट ट्रेन को भी!

फिजिबिलिटी रिपोर्ट देने से इनकार
नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन ने एक आरटीआई के तहत मांगी गई फिजिबिलिटी यानी व्यवहार्यता रिपोर्ट देने से इनकार कर दिया। जब नफे का प्रोजेक्ट है तो छिपाना क्या और नुकसान का है तो समूचे देश के लिए चिंताजनक है और शक भी पैदा करता है। एनएचएसआरसी के इस रवैये पर एक पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त ने रेलवे को आड़े हाथ लिया है कि ऐसा कौन-सा व्यापारिक और गोपनीय हित प्रभावित होने या स्पर्धा का खतरा है। फिजिबिलिटी रिपोर्ट जानना जनता का अधिकार है। खैर, रिपोर्ट नहीं बताने से सीधे-सीधे प्रोजेक्ट की व्यवहार्यता या सफलता पर संदेह की सुई घूमती है।

बहरहाल, जैसा कि बुलेट टे्रन या सरकार समर्थक जैसा दावा करते हैं कि यह विकास के लिए जरूरी है। ऐसे में यह दुआ करने के अलावा कोई चारा नहीं कि बुलेट ट्रेन का बोझ आम आदमी की जेब पर न पड़े और कुशल संचालन से ऋण चुकता हो जाए।

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