वोट के लालच ने नहीं बनने दी शेखावत कॉलोनी, न आदर्श बस्ती

जवाहर नगर कच्ची बस्ती का मामला, विधायक सराफ ने विकास के नाम पर बटोरे वोट, अब परनामी भी खेल रहे वही खेल

By: Priyanka Yadav

Published: 13 Mar 2018, 12:05 PM IST

जयपुर . जवाहर नगर कच्ची बस्ती के लोगों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने का काम हर नेता ने जमकर किया। मौजूदा विधायक अशोक परनामी से पहले विधायक कालीचरण सराफ ने भी लोगों को विकास का सपना दिखा वोट बटोरने में कसर नहीं छोड़ी। यह सफर शेखावत कॉलोनी से आदर्श बस्ती के सपने दिखाने तक चल रहा है। यह हिस्सा पहले विधायक सराफ के विधानसभा क्षेत्र में रहा। उन्होंने इसका नाम शेखावत कॉलोनी (पूर्व उपराष्ट्रपति व पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत के नाम) रखने और फिर विकसित इलाके में रूप में सहेजने का वादा किया। सार्वजनिक रूप से लोगों को प्लानिंग बताई, लेकिन चुनाव नतीजे आते ही मतदाताओं को भुला दिया। इसके बाद परनामी ने शेखावत कॉलोनी की जगह आदर्श बस्ती का नारा दिया। दो बार इसकी डिजाइन के कागज बंटवाकर मतदाताओं को रिझाते रहे। दोनों ही नेता वादा पूरा नहीं कर पाए। इसके बावजूद एक बार फिर पक्के आवास दिलाने का प्लान फाइलों से निकाल लिया गया।

 

सर्वे भी भूले, नहीं बनी बहुमंजिला इमारत

- परनामी ने किया था आदर्श बस्ती के तहत पक्के आवास निर्माण करने का वादा।

- इसमें भूतल सहित तीन से चार मंजिला इमारत, जिसमें आवंटन। इसके लिए सर्वे कराने की बात कही गई।

- मौजूदा जगह को सड़क के लिए छोडऩे और उससे पीछे की तरफ सुनियोजित आदर्श बस्ती बसेगी।

 

न पट्टे मिले, न पेयजल

- सराफ ने बस्ती में रहने वाले लोगों को वहीं बसाकर सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया। इन्हें पट्टे दिलाने का भरोसा दिलाया।

- बेहतर चिकित्सा सुविधा और स्कूल के साथ पक्की सड़क और स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने का वादा किया

- शेखावत कॉलोनी के नाम पर सुविधा के आश्वासन के बावजूद लोग स्वच्छ पेयजल और साफ-सफाई को तरस रहे है।

 

राजनीति काखेल, मिला सिर्फ इंतजार

शहर के मध्य में बसी जवाहर नगर कच्ची बस्ती की नींव 'राजनीतिक पनाहगाह के रूप में उभरकर सामने आई है। सालों से यहां सरकारी भूमि और वन क्षेत्र में कब्जे का खेल चलता रहा, लेकिन किसी ने कार्रवाई नहीं की। दरअसल, पूरा मामला 24 हजार वोटों की राजनीति से जुड़ा है। यह बस्ती आदर्श नगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है।

राजधानी की अन्य सीटों के मुकाबले यहां हार-जीत का अंतर कम रहता है। ऐसे में कोई भी दल मतदाताओं से नाराजगी का खतरा मोल लेना नहीं चाहता। जब भी बस्ती को लेकर मामला उठता है तो राजनेता खुद की जमीन हिलने की चिंता में या तो चुप्पी साध लेते हैं या फिर पक्के आवास का लॉलीपोल थमा आते हैं।

Priyanka Yadav
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