नाखून चबाने वाले बच्चे ही अपनी बातें नहीं कह पाते

कुछ बच्चों में मिट्टी, चॉक या पेंसिल, दीवार का प्लास्टर आदि खाना या फिर नाखून कुतरना, शर्ट की कॉलर को मुंह में लेना, अंगूठा चूसना जैसी अजीब सी आदतें होती हंै। माता-पिता के बार-बार टोकने पर भी बच्चे की इन हरकतों में कोई बदलाव नहीं आता। ज्यादा रोका-टोकी से बच्चे छिपकर ऐसी हरकतें करने लगते हैं। इन आदतों को छुड़वाने के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि इनके पीछे वजह क्या है? जानते हैं इसके बारे में-

By: Archana Kumawat

Published: 21 Nov 2020, 07:00 PM IST

मिट्टी या चॉक खाना, पोषक तत्वों की कमी
बच्चों में मिट्टी, चॉक, दीवार का प्लास्टर खाना जैसी आदतें हैं तो वास्तव में ये एक बीमारी के लक्षण हैं, जिसे पाइका कहा जाता है। पाइका की वजह में पोषक तत्वों की कमी, कमजोरी, भूख न लगना, पेट में दर्द या कीड़ों की समस्या हो सकती हैं। ऐसे बच्चों में आयरन, विटामिन डी एवं कैल्शियम की कमी भी हो सकती है। बच्चे का चेहरा पीला पडऩे लगता है और उनका वजन बढऩा भी रुक जाता है। इसलिए बच्चों के आहार में आयरन और कैल्शियम से भरपूर चीजे हों। साथ ही बच्चों का खाना भी लोहे के बर्तनों में पकाएं। ऐसे बच्चों को तीन से छह महीने तक आयरन थैरेपी देने से लाभ मिलेगा। मिट्टी खाने से पेट में कीड़े भी चले जाते हैं, ऐसे में डॉक्टर की सलाह पर कीड़ों को मारने की दवा देना भी जरूरी है।

शर्ट का कॉलर चबाना: अवसाद तो नहीं!
चार से आठ साल के कुछ बच्चों में शर्ट की कॉलर को चबाना और बार-बार मुंह से नाखून कुतरने की आदत होती है। ऐसी आदतें ज्यादातर उन बच्चों में देखी जा सकती हंै जो डिप्रेशन में रहते हैं या फिर खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते। इन्हें मनोवैज्ञानिक तरीके से समझाने की जरूरत होती है। प्यार और अनुशासन से इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है। बिहेवियर थैरेपी से भी बच्चों की इन आदतों में बदलाव लाया जा सकता है।

बच्चों के लिए जरूरी है रोजाना एक घंटे की धूप
बच्चों में इस तरह की आदतों में बदलाव लाने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें पूरा समय दिया जाए। उनका ध्यान उनकी उम्र के अनुसार दूसरे कामों में लगाएं। साथ ही संतुलित आहार दें, जिसमें हरी सब्जियों और फलों का प्रयोग भरपूर हो। जंक फूड्स खिलाने एवं बोतल से दूध पिलाने से बचें। विटामिन डी की कमी को दूर करने के लिए बच्चों का रोजाना सुबह एक घंटे की धूप लेना जरूरी है। यदि फिर भी आदतों में बदलाव नहीं आए तो मनोचिकित्सक की मदद ले सकते हैं।

डॉ. शरद थोरा, शिशु रोग विशेषज्ञ एवं पूर्व डीन एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर
डॉ. आलोक उपाध्याय
सह आचार्य, जेके लॉन हॉस्पिटल, एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर

Archana Kumawat
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