लॉकडाउन में भेड़पालकों के उधारी में काट रहे दिन


पाली. देशभर में पिछले दो माह से लॉकडाउन के कारण मुंबई व हैदराबाद की बकरा मंडी बंद होने से जिले भर में करीब दस हजार भेड़पालकों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। भेड़पालकों की आमदनी का मुख्य जरिया यही है। उधारी से दिन काट रहे भेड़पालकों के सामने अब परिवार का पेट पालने की भी चुनौती खड़ी हो गई है।

By: Sudhir Bile Bhatnagar

Published: 17 May 2020, 05:24 PM IST

जिले भर से करीब आठ लाख भेड़ें मध्यप्रदेश व गुजरात में चराई के लिए गई हुई है। भेड़पालकों के आमदनी के दो मुख्य स्रोत है। पहला बकरा व गेटे बेचते हैं। दूसरी, भेड़ों की ऊन बिकती है। विदेशी ऊन के मुकाबले देशी ऊन महंगी पड़ती है। इस कारण भेड़पालकों को ऊन कटाई के रुपए भी नहीं मिल पाते हैं। ऐसी स्थिति में भेड़पालकों के सामने लॉकडाउन के कारण यह स्रोत भी बंद हो गया है।
पशुओं के लिए खड़ा हुआ चारे का संकट
चौसला (नागौर). ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने गए पशुपालन व्यवसाय पर लॉकडाउन का विपरीत असर पड़ा है। क्षेत्र के पशुपालकों का समूह हर वर्ष चारे-पानी के लिए अलवर, उदयपुर, डूंगरपुर, चौमू, सीकर के पहाड़ी इलाके की ओर पलायन करते है, लेकिन इस बार लॉकडाउन के चलते वे यही पर बैठे हैं। पशुपालकों के सामने चारे-पानी की समस्या खड़ी हो गई है। खेतों में डेरा डाल रखे रेबारी व गुर्जर जाति के पशुपालक परेशान है। रेबारी जाति के कुछ पशुपालकों ने पत्रिका को बताया कि जिलों की सीमाएं सील कर दी। इस कारण उन्हें जहां थे वहीं डेरा डालना पड़ा,अब पशुओं के लिए चारा-पानी कहां से लाए।

Sudhir Bile Bhatnagar
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