डेथ वारंट का मतलब सुनिश्चित मृत्युदंड कतई नहीं

2019 में छह मामलों में डेथ वारंट अंतत: या तो रद्द हो गए या बड़ी अदालतों ने स्टे कर दिया

 

नई दिल्ली
निर्भया बलात्कार तथा हत्याकांड में अदालत ने दूसरी बार चार दोषियों के खिलाफ डेथ वारंट जारी किया है। पिछले साल के ऐसे मामलों पर गौर करें तो डेथ वारंट का मतलब सुनिश्चित मृत्युदंड कतई नहीं होता।
दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोजेक्ट 39ए की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में देशभर की विभिन्न अदालतों ने छह डेथ वारंट जारी किए। इस सभी को सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालयों ने रोक दिया था। डेथ वारंट में मृत्युदंड के दोषी की फांसी की तारीख निर्धारित की जाती है और वह दोषी को फांसी देने के अंतिम चरणों में से एक है। यह आमतौर पर एक अपराधी द्वारा सभी कानूनी उपायों को समाप्त करने के बाद जारी किया जाता है।
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चार डेथ वारंट सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किए
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में जारी छह डेथ वारंटों में से एक को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि कानून के तहत दोषी को मिलने वाले सभी ‘प्रावधान’ पूरे नहीं हुए। शीर्ष अदालत द्वारा तीन अन्य डेथ वारंट को भी उसी आधार पर रोक दिया गया था।
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दो पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक
एक डेथ वारंट को बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया और दोनों दोषियों की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलने का फैसला सुनाया। एक अन्य डेथ वारंट को मद्रास हाईकोर्ट ने इस आधार पर रोक दिया कि राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर करने का याचिकाकर्ता का अधिकार अभी भी लंबित था।
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ट्रायल कोर्ट में फांसी...
102 लोगों को फांसी की सजा सुनाई ट्रायल कोर्ट ने 2019 में
04 वर्षों में यह आंकड़ा सर्वाधिक था
52.94 प्रतिशत (54) मामले इनमें से यौन अपराधों से जुड़े थे
2016 में फांसी की सजा पाने वालों में 18 प्रतिशत यौन अपराधी थे
2017 में यौन अपराधियों का आंकड़ा 39.81 प्रतिशत और 2018 में 41.35 प्रतिशत था
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हाईकोर्ट ने की पुष्टि
26 दोषियों (15 मामलों के) को मृत्युदंड देने की पुष्टि की देश के हाईकोट्र्स ने 2019 में
04 साल में यह मामला सर्वाधिक था
65.38 फीसदी यौन अपराधी थे इनमें
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...और सुप्रीम कोर्ट में
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में 2001 के बाद से मौत की सजा के मामलों में सबसे अधिक फैसले (27) सुनाए। पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने मौत की सजा के मामलों को प्राथमिकता से निपटाने के लिए लिस्ट कराए थे। सुप्रीम कोर्ट में 27 मामले पहुंचे थे। इनमें से तीन मामलों में दस लोग बरी हो गए थे। दो में फ्रेश ट्रायल के आदेश हुए। छह मामलों में पुष्टि की गई। 17 अन्य मामले प्रक्रियाधीन हैं। भारत में 31 दिसंबर तक कुल 378 कैदी ऐसे थे जिन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी।

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Vijayendra Desk
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