और कितना दबाव झेलेंगे जिले के अस्पताल...?

जिलेभर के अस्पतालों में चिकित्सकों के करीब 40 फीसदी रिक्त पड़े हैं...कुछ अस्पताल तो पूरी तरह से प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत चिकित्सकों के भरोसे संचालित हैं...अधिकतर अस्पतालों में प्रसव बिना स्त्री रोग विशेषज्ञ की मौजूदगी में किए जा रहे हैं। रात में यहां उपचार मिलना सम्भव ही नहीं। ये हालात हैं जिले के ब्लॉक स्तर के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के।

By: Nidhi Mishra Nidhi Mishra

Published: 17 Mar 2016, 12:46 PM IST

जिलेभर के अस्पतालों में चिकित्सकों के करीब 40 फीसदी रिक्त पड़े हैं...कुछ अस्पताल तो पूरी तरह से प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत चिकित्सकों के भरोसे संचालित हैं...अधिकतर अस्पतालों में प्रसव बिना स्त्री रोग विशेषज्ञ की मौजूदगी में किए जा रहे हैं। रात में यहां उपचार मिलना सम्भव ही नहीं। ये हालात हैं जिले के ब्लॉक स्तर के प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के।

अव्यवस्था का दंश झेल रहे इन अस्पतालों में उचित उपचार नहीं मिलने की वजह से लोगों को लम्बा सफर तय कर जोधपुर तक आना पड़ रहा है। जिले के अस्पतालों में चिकित्सकों के स्वीकृत 393 पदों में से 151 पद रिक्त हैं। जिले के चार ब्लॉक के अस्पतालों का जब जायजा लिया गया तो वहां की उपचार व्यवस्थाओं की बदहाली उजागर हुई। यहा वजह है कि शहर के प्रमुख अस्पतालों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है।

190 स्वास्थ्य केन्द्र किराए के भवन में
जिले में 24 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र (सीएचसी), 84 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र (पीएचसी) और 678 उप स्वास्थ्य केन्द्र हैं। इनमें से कई स्वास्थ्य केन्द्रों के पास तो उपचार सुविधाएं तो दूरी बल्कि मानकों के अनुरूप भवन ही उपलब्ध नहीं है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित 18 पीएचसी और 172 उपस्वास्थ्य केन्द्र यानी कुल 190 चिकित्सालय ऐसे ही किराए के भवनों में संचालित हैं।

ओसियां: प्रतिनियुक्ति के भरोसे अस्पताल
ओसियां की 20 हजार की आबादी के लिए 30 बेड की क्षमता का एक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है, जिसमें चिकित्सकों के 5 पद स्वीकृत हैं। ये पांचों रिक्त हैं। यहां प्रतिनियुक्ति पर पांच अन्य चिकित्सक लगाए हुए हैं। यहां रात के वक्त उपचार की व्यवस्था नगण्य है। कहने को अस्पताल की एक और एक 108 एम्बुलेंस मौजूद है लेकिन जरूरत पडऩे पर मरीज व घायलों को निजी एम्बुलेंस के लिए 1100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञों की कमी
अस्पताल में कोई प्रसूती रोग या स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं है। ऐसे में यहां नर्सिंग स्टाफ द्वारा प्रसव कराया जाता है। यदि कोई भी प्रसव का मामला बिगड़ता है तो उन्हें जोधपुर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

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फलोदी: आधे से अधिक पद रिक्त, मरीज परेशान
100 बेड की क्षमता वाला फलोदी के राजकीय चिकित्सालय में हर दिन करीब 400-500 मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं, लेकिन यहां डॉक्टरों के स्वीकृत 22 पदों में से 14 पद रिक्त हैं। अस्पताल सिर्फ 8 चिकित्सकों के भरोसे संचालित है। चिकित्सकों का अभाव होने की वजह से अधिकतर मरीजों को उपचार के लिए 140 किलोमीटर का सफर तय कर के जोधपुर या फिर बीकानेर जाना पड़ रहा है। अस्पताल में हर माह करीब 80-100 प्रसव होते हैं, लेकिन यहां स्त्री व प्रसूति रोग विशेषज्ञ का अभाव है। ऐसे में नर्सिंगकर्मियों को प्रसव कराना पड़ता है।

क्रमोन्नति के आदेश पर नहीं हो रहा अमल
राज्य की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय में फलोदी स्थित राजकीय चिकित्सालय को जिला अस्पताल के समकक्ष दर्जा देते हुए 150 बेड में क्रमोन्नत करने के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन इस आदेश पर ढाई साल बाद भी वित्तीय स्वीकृति जारी नहीं हो पाई है।

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बिलाड़ा: सरकारी व्यवस्थाओं से मायूस हो
बिलाड़ा कस्बे के एक मात्र सरकारी अस्पताल में कहने को सौ बेड की क्षमता व चिकित्सकों के 11 पद स्वीकृत हैं, बावजूद इसके यहां के मरीजों को या तो निजी अस्पतालों का या फिर 80 किमी दूर जोधपुर स्थित बड़े अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।

वजह है यहां चिकित्सकों की कमी और अपर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं। यहां चिकित्सकों के 11 में से 5 पद रिक्त हैं। हालांकि तीन चिकित्सकों को प्रतिनियुक्ति पर भी लगाया गया है लेकिन फिर भी मरीजों को उचित उपचार नहीं मिल पा रहा है।

बेकार जा रही भामाशाहों की मदद
इस अस्पताल के निर्माण में स्थानीय भामाशाहों ने लाखों रुपए की मदद दी है। अस्पताल में तीन बड़े वार्ड और नेत्र रोगियों के लिए विशेष वार्ड की सुविधा है। अस्पताल के महंगे उपकरण व औजार जंग खा चुके हैं। यही हाल ऑपरेशन थियेटर का है। मुख्यालय से आने वाली टीम ही ऑपरेशन थिएटर में ऑपरेशन करती है, वो अपने साथ लाए उपकरणों से। रक्त जांच व स्टोरेज के उपकरण धूल फांक रहे हैं और सोनोग्राफी कक्ष पर ताला लटका है।

अस्पताल की एम्बुलेंस खराब
अस्पताल की एम्बुलेंस लम्बे समय से खराब है और गैरेज में खड़ी है। यही वजह है कि मरीजों को निजी एम्बुलेंस का सहारा लेना पड़ता है। जोधपुर तक जाने के लिए मरीजों को करीब 1100 रुपए खर्च करने पड़ते हैं।

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पीपाड़ : आईसीयू वार्ड व ओटी पर ताला
पीपाड़ के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र के आईसीयू वार्ड, ऑपरेशन थिएटर और सोनोग्राफी कक्ष जैसी महत्वपूर्ण चिकित्सा सुविधाओं पर महीनों से ताले लटके हैं। 50 बेड की क्षमता वाले इस अस्पताल में चिकित्सकों के कुल 11 में से 5 पद रिक्त हैं।

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रेडियोलॉजिस्ट, सर्जन और एनेस्थेटिक की कमी के कारण यहां किसी प्रकार की ऑपरेशन सुविधाएं मरीजों को नहीं मिल पा रही हैं। ऑपरेशन थिएटर के उपकरणों को जंग लग चुकी है। मजबूरन मरीजों को या तो निजी अस्पतालों में उपचार कराना पड़ रहा है या फिर बेहतर उपचार की उम्मीद में जोधपुर का रुख कर रहे हैं।

काम नहीं आ रहा भामाशाहों का दान
लोगों की मदद के लिए सन् 1962 में प्रवासी भामाशाहों ने अस्पताल के लिए भूमि दान दी और अस्पताल भवन का निर्माण करवाया। लेकिन अब अस्पताल में मौजूद सुविधाओं का मरीजों को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। सुविधाओं का सही उपयोग नहीं होने की वजह से अब भामाशाहों ने भी मुंह फेर लिया है।

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हां, विशेषज्ञों की कमी है
विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है। सर्जन की कमी की वजह से पीपाड़ अस्पताल का ओटी बंद हैं। सीएचसी व पीएचसी सुबह-शाम ही खुलता है। आपातकालीन स्थिति के लिए चिकित्सक अस्पताल के पास ही रहते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों की व्यवस्थाओं को जांचने के लिए ब्लॉक सीएमएचओ को समय-समय पर ट्यूर करने के लिए बोल रखा है। हम भी समय-समय पर निरीक्षण करते हैं, कमी पाई जाती हैं तो कार्रवाई करते हैं।
-डॉ. अनिल मित्तल, सीएमएचओ, जोधपुर
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