Dr. Manmohan Singh: यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर जब बन गया हिंदुस्तान का PM, जाने अब तक के सफर की रोचक बातें

Dr. Manmohan Singh: यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर के सियासी सफर की रोचक बातें : सिंह 1997 से 2019 तक असम से राज्यसभा सदस्य रहे हैं। सिंह करीब तीन दशक से इस उच्च सदन के सदस्य रहे हैं। वह 1991 से 2019 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। राज्यसभा में उनका कार्यकाल 14 जून को खत्म हुआ।

By: nakul

Updated: 13 Aug 2019, 10:32 AM IST

 

Dr. Manmohan Singh Rajya Sabha Congress candidate from Rajasthan: राज्यसभा सीट के लिए 26 को होने वाले चुनाव के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंगलवार को अपना नामांकन दाखिल कर रहे हैं। मनमोहन सिंह कुछ समय पहले राजस्थान विधानसभा में विधायकों के एक कार्यक्रम के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। इसके बाद से ही ये अटकलें शुरू हो गई थीं कि वह इस बार राजस्थान से ही राज्यसभा पहुंचेंगे।


1997 से 2019 तक असम से राज्यसभा सदस्य:-
सिंह 1997 से 2019 तक असम से राज्यसभा सदस्य रहे हैं। सिंह करीब तीन दशक से इस उच्च सदन के सदस्य रहे हैं। वह 1991 से 2019 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। राज्यसभा में उनका कार्यकाल 14 जून को खत्म हुआ। सिंह को फिर से इसलिए नामित नहीं किया जा सका, क्योंकि कांग्रेस असम में सत्ता में नहीं है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदनलाल सैनी के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी।


भाजपा पसोपेश में:-

भाजपा ने अभी तक प्रत्याशी खड़ा करने के संबंध में रुख स्पष्ट नहीं किया है। संख्या बल भाजपा के पास महज 72 है, जबकि जीत के लिए 100 विधायकों की आवश्यकता है। ऐसे में पार्टी केंद्रीय नेतृत्व के निर्देशों का इंतजार कर रही है। कांग्रेस के पास जीत का आंकड़ा है। इसके अलावा 12 निर्दलीय, 6 बसपा और रालोद के एक विधायक भी कांग्रेस को समर्थन दे रहे हैं, ऐसे में सिंह की जीत तय मानी जा रही है।


14 महीने बाद राज्यसभा में खुल सकता है कांग्रेस का खाता:-

यह पहली बार हुआ है कि राज्यसभा के 10 सांसदों में से राजस्थान से एक भी राज्यसभा सांसद कांग्रेस का नहीं है। करीब १४ महीने पहले से कांग्रेस की यह स्थिति है। कांग्रेस को अप्रेल 2020 तक इंतजार करना था, लेकिन मदनलाल सैनी के निधन होने से कांग्रेस को अब आठ महीने पहले ही राज्यसभा में मौका मिल जाएगा।

जाने डॉ मनमोहन सिंह के बारे में ( Interesting and Unknown facts of Dr. Manmohan Singh ):-

- ब्रिटिश भारत (वर्तमान पाकिस्तान) के पंजाब प्रान्त में 26 सितम्बर, 1932 को हुआ जन्म, माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरुमुख सिंह था। देश के विभाजन के बाद सिंह का परिवार भारत चला आया। डॉ सिंह के परिवार में उनकी पत्नी गुरशरण कौर और तीन बेटियां हैं।

- सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक और फिर स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

- इसके बाद पीएच.डी करने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। फिर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी.फिल किया।

- उनकी पुस्तक इंडियाज़ एक्सपोर्ट ट्रेंड्स एंड प्रोस्पेक्ट्स फॉर सेल्फ सस्टेंड ग्रोथ भारत की अन्तर्मुखी व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है।

- डॉ सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वे पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकनामिक्स में प्राध्यापक रहे।

- वे संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन सचिवालय में सलाहकार भी रहे और 1987 और 1990 में जेनेवा में साउथ कमीशन में सचिव भी रहे। 1971 में डॉ सिंह भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किये गए।

- 1972 में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया। इसके बाद के वर्षों में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमन्त्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं।

- भारत के आर्थिक इतिहास में हाल के वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब डॉ सिंह 1991 से 1996 तक भारत के वित्त मंत्री रहे। उन्हें भारत के आर्थिक सुधारों का प्रणेता माना गया।

- मनमोहन सिंह भारत के 13 वें प्रधानमंत्री बने। लोकसभा चुनाव 2009 में मिली जीत के बाद वे जवाहरलाल नेहरू के बाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने, जिनको 5 वर्षों का कार्यकाल सफलता पूर्वक पूरा करने के बाद लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला है।

- इन्हें 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में वित्त मन्त्री के रूप में किए गए आर्थिक सुधारों के लिए भी श्रेय दिया जाता है।


... न राज्यसभा, न लोकसभा सांसद- फिर भी मिली 'वित्त' की कमान:-

जब पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1991 में अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया। इस समय डॉ मनमोहन सिंह न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा के सदस्य थे। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार के मंत्री को संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। इसलिए उन्हें 1991 में असम से राज्यसभा के लिए चुना गया।


मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण को उपचार के रूप में प्रस्तुत किया और भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के साथ जोड़ दिया। डॉ॰ मनमोहन सिंह ने आयात और निर्यात को भी सरल बनाया। लाइसेंस एवं परमिट गुज़रे ज़माने की चीज़ हो गई। निजी पूंजी को उत्साहित करके घाटे में चलने वाले सार्वजनिक उपक्रमों के लिए अलग से नीतियाँ विकसित कीं।


नई अर्थव्यवस्था जब घुटनों पर चल रही थी, तब पीवी नरसिम्हा राव को कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा। विपक्ष उन्हें नए आर्थिक प्रयोग से सावधान कर रहा था। लेकिन राव ने मनमोहन सिंह पर पूरा यक़ीन रखा। मात्र दो वर्ष बाद ही उदारीकरण के बेहतरीन परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था में नज़र आने लगे। इस तरह से एक ग़ैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति जो अर्थशास्त्र का प्रोफ़ेसर था, भारतीय राजनीति में प्रवेश हुआ ताकि देश की बिगड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया जा सके।

 

सोर्स:- विकिपीडिया

nakul Desk
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned