केसरियाजी में उड़े रे गुलाल, जय बोलो काला बावसी की

केसरियाजी के दरबार में सर्व—धर्म सम्भाव का दिग्दर्शन

By: Mohan Murari

Updated: 29 Mar 2019, 07:32 AM IST

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर/डूंगरपुर। प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जन्मोत्सव पर उदयपुर जिले की धुलवे नगरी सर्व धर्म सम्भाव और सौहार्द्र की सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बनी नजर आई। केसरियालाल, कालाबावसी, धुलेवा रा धणी जैसे कई नामों से पुकारे जाने वाले भगवान ऋषभदेव के जन्मोत्सव पर मेले में वागड़-मेवाड़ ही नहीं देश भर से सभी जाति-समुदाय के लोग दर्शनार्थ पहुंचे। पूरा केसरियाजी कस्बा मेले में परिणित सा हो गया। कस्बे की हर सड़क, गली में मेलार्थियों की रेलमपेल रही। दर्शन व शोभायात्रा और रथ से वर्ष का पूर्वानुमान लगाने की प्रथा देखने जनमैदिनी उमड़ी। स्वर्ण आंगी के दर्शनों को उमड़े लोग जन्मोत्सव पर गुरुवार देर शाम भगवान को मुख्य स्वर्ण व हीरे जड़ित आंगी धारण कराई गई। इसके दर्शन के लिए भी बड़ी संख्या में लोग उमड़े। यह आंगी विशेष अवसरों पर ही धारण कराई जाती है। बताया जाता है कि यह आंगी 35 किलो सोने से बनी हुई है तथा इस पर हीरे जड़े हुए हैं। इसकी लागत करीब 11 करोड़ के आसपास है।
केसर चढ़ा कर छोड़ी मन्नतें
केसरियाजी मंदिर में भगवान को केसर चढ़ाने की खासी मान्यता है। बताया जाता है कि मंदिर में हर साल करीब 80 लाख रुपए की केसर चढ़ती है। जन्मोत्सव पर तीन से चार बार भगवान का प्रक्षाल और केसर पूजा हुआ। हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने भी केसर समर्पित किया। लोगों की मान्यता है कि मंदिर में केसर चढ़ाने की मन्नत लगने पर हर दु:ख का निवारण होता है और मनोकामना पूर्ण होती है। जन्मोत्सव पर पहुंचे लोगों ने श्रद्धा और सामथ्र्य अनुसार केसर चढ़ा कर मन्नतें छोड़ी।
ठाठ-बाट के साथ निकले 'धुलेवा के धणी'
जन्मोत्सव का मुख्य आकर्षण धुलेवा धणी की ठाठ बाट से निकली शोभायात्रा रही। गुरुवार शाम चार बजे मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर लोगों को हुजूम उमड़ पड़ा। श्रीजी के विग्रह को पालकी को विराजित कर हाथी घोड़ा पालकी जय केसरियालाल की के जयकारों के साथ मंदिर से बाहर लाया गया। भगवान की पालकी बाहर आते ही श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर था। लोगों ने केसरियालाल के जयकारों से गगन गूंजा दिया। इससे पूर्व देवस्थान विभाग की ऋषभदेव फोर्स विंग के जवान पुलिस बैंड के साथ परेड़ करते हुए मंदिर के सामने पहुंचे। भगवान को 60 किलोग्राम चांदी से बने ऐतिहासिक रथ में विराजित करने के बाद जवानों ने तीन राउंड हवाई फायर कर सलामी दी। इसके बाद शोभायात्रा रवाना हुई। सबसे आगे पुलिस बैंड औरजवानों की टुकड़ी परेड़ करती हुई चल रही थी। इसके बाद आदिवासी संत-महंत, कोटवाल और भक्तजन स्थानीय वागड़ी भजन करते झुमते हुए चल रहे थे। केसरियाजी में उड़े से गुलाल, जय हो बाबा री. . भजन पर श्रद्धालु मुग्ध से होकर नाचने लगे। मार्ग में जगह-जगह भगवान के रथ पर पुष्प और अक्षत वर्षा कर अगवानी की गई। रथयात्रा पगल्याजी मंदिर पहुंची। वहां भी जवानों ने तीन राउंड फायर कर सलामी दी।
लगाया पूर्वानुमान
जन्मोत्सव के साथ एक पौराणिक मान्यता भी जुड़ी हुई है। मंदिर से रजत रथ के साथ निकलने वाली शोभायात्रा में आगे चल कर काष्ठ रथ भी जुड़ता है। इसके बाद शोभायात्रा विद्यालय परिसर के समीप पहुंचती है। यहां ढलान पर काष्ठ रथ को छोड़ दिया जाता है। रथ स्वत: आगे बढ़ता है। मान्यता है कि रथ जितना आगे बढ़ता है और जिस दिशा में मुड़ता है, उस आधार पर आने वाले साल का अनुमान लगाया जाता है। सूत्रों ने बताया, इस वर्ष रथ प्रति वर्ष की तरह ही औसत दूरी तक स्वत: बढ़ा तथा बाईं ओर मुड़ा। लोगों की मान्यता है कि यह साल औसत रहना है। बारिश ठीक-ठाक होगी तथा साल भी मिला जुला गुजरेगा। केसरियानाथ का दरबार सभी जाति-धर्म के लोगों के लिए खुला हुआ था। आदिवासी समुदाय के लोग हजारों की तादाद में अपने आराध्य काला बावसी के दर्शनों के लिए पहुंचे। जन्मोत्सव के अवसर पर सभी महिला-पुरुषों को मंदिर के गर्भगृह तक जाकर भगवान का अभिषेक करने की अनुमति थी।

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