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कुमाऊं में हुआ था आईपन कला का उद्गम - ऋचा कुशवाहा

आईपन एक पारम्परिक पेंटिंग कला है, जिसका उद्गम कुमाऊं में हुआ था। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व से जुड़ी यह कला वर्तमान में उत्तराखंड राज्य में सर्वाधिक प्रचलित है। यह कहना है भोपाल की युवा कलाकार ऋचा कुशवाहा का।

जयपुर

Published: November 15, 2021 09:18:13 pm

युवा कलाकार ऋचा ने किया आईपन पेंटिंग वर्कशॉप का संचालन

आईपन एक पारम्परिक पेंटिंग कला है, जिसका उद्गम कुमाऊं में हुआ था। सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक महत्व से जुड़ी यह कला वर्तमान में उत्तराखंड राज्य में सर्वाधिक प्रचलित है। यह कहना है भोपाल की युवा कलाकार ऋचा कुशवाहा का। वे सोमवार को राजस्थान स्टूडियो की सहायता से भारत की आर्टिस्ट कम्यूनिटी द सर्किल के लिए आयोजित लक्ष्मी पद आईपन की ऑनलाइन वर्कशॉप में संबोधित कर रहीं थी। वर्कशॉप का आयोजन आजादी का अमृत महोत्सव सेलिब्रेटिंग इंडिया एट 75 के तहत किया गया।
ऋचा ने बताया कि आईपन कला में पारंपरिक तौर पर महिलाओं की ओर से पूजा स्थल, घर के प्रवेश द्वार के फर्श अथवा दीवारों पर गेरू मिट्टी से बेस बनाकर चॉक अथवा राइस पाउडर से डिजाइन बनाए जाते हैं। इस आर्ट फॉर्म का उपयोग गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, दिवाली के अवसर पर समारोह के अनुसार स्वास्तिक, नव दुर्गा चौकी, सरस्वती चौकी अथवा लक्ष्मी पद बनाने के लिए किया जाता है। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में इसे मांडणा, पश्चिम बंगाल एवं ओडिशा में अल्पना के नाम से भी जाना जाता है।
कुमाऊं में हुआ था आईपन कला का उद्गम - ऋचा कुशवाहा
कुमाऊं में हुआ था आईपन कला का उद्गम - ऋचा कुशवाहा
लक्ष्मी पद चिह्न बनाने सिखाए

ऋचा ने लाल रंग की हैंडमैंड पेपर शीट पर व्हाइट पोस्टर कलर से ट्राइएंगल पैटर्न से बॉर्डर बनाई। इसके बाद उन्होंने पेपर शीट के केंद्र में सर्किल बना कर एस पैटर्न के लक्ष्मी पद चिह्न की आकृति बनाई और अन्य डिजाइन बना कर सर्किल को डेकोरेट किया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न आकृति के लक्ष्मी पद चिह्न बनाने भी सिखाए। उन्होंने बताया कि पेंटिंग में मैट फिनिश लाने के लिए पोस्टर कलर का उपयोग किया जाता है, जबकि ऐके्रलिक कलर से इसका लुक ग्लॉसी आता है।

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