सोशल मीडिया भी होगा जीडीपी का हिस्सा ?

सोशल मीडिया भी होगा जीडीपी का हिस्सा ?

Mohmad Imran | Updated: 28 Jul 2019, 04:31:48 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

सोशल मीडिया भी होगा जीडीपी का हिस्सा ?


-फ्री समझे जाने वाले सोशल मीडिया पर हुआ दिलचस्प सर्वे


-शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ऑनलाइन गतिविधि आने वाले सालों में जीडीपी का हिस्सा बनाई जानी चाहिए।

एक दशक में इंटरनेट और सोशल मीडिया की भूमिका हमारे जीवन में पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब जीडीपी की गणना में अन्य सेवा एवं उत्पादों के पैमाने को भी शामिल करना चाहिए। क्योंकि इसमें मुफ्त ऑनलाइन उत्पाद एवं सेवाएं जैसे सोशल मीडिया, सर्च इंजन, डिजिटल मैप, ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग और ऐसी ही इन सेवाएं शामिल नहीं है। मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (एमआइटी) के शोधकर्ताओं ने हाल ही सभी मुफ्त डिजिटल उत्पादों का जीडीपी पर असर का अध्ययन किया? शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ऑनलाइन गतिविधियों को आने वाले सालों में जीडीपी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

 

वॉट्सऐप के लिए 42 हजार प्रतिमाह
शोध अनुसार अमरीकी उपभोक्ताओं के लिए फेसबुक का मासिक खर्च करीब 40 से ५50 डॉलर (2700 से 3400 रुपए) है। वहीं यूरोपीय देशों में डिजिटल मैप देखने का मासिक खर्च 59 यूरो (करीब 4600 रुपए) से ज्यादा है। भारत में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाले फ्री मैसेजिंग टूल वॉट्स ऐप के लिए प्रतिमाह 611 अमरीकी डॉलर यानि करीब 42 हजार 180 रुपए चुकाने होंगे।

 

तेज़ी से बढ़ रहा है सूचना उद्योग
शोध के इन निष्कर्षों के आधार पर निश्चित रूप से जीडीपी में बदलाव और सुधार के बारे में सोचने के पर्याप्त कारण हैं। अमरीका में 1980 से 2016 के बीच कम्प्यूटिंग तकनीक में बड़े पैमाने पर वृद्धि हुई है। अमरीकी जीडीपी में इन्फॉर्मेशन सेक्टर इस दौरान 4 से 5 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ लगातार मजूबत हो रहा है।

 

यूजर्स ने ही किया मूल्य निर्धारण
शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर तीन ऑनलाइन सर्वेक्षण कर लोगों को यूजर के रूप में इन मुफ्त ऑनलाइन डिजिटल सेवाओं की मासिक कीमत (प्राइस टैग) निर्धारित करने को कहा था जिनका वे उपयोग कर रहे थे। उत्तरदाताओं से यह भी पूछा गया कि क्या वे इन मुफ्त ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग करते रहना पसंद करेंगे या एक तय कीमत लेकर इसे छोड़ देंगे? सर्वे में करीब 65 हजार उत्तरदाताओं ने हिस्सा लिया थाा। ऑनलाइन सेवाओं और उनसे जुड़ी कंपनियों के संबंध में कई निष्कर्ष सामने आए।


उपभोक्ताओं ने यूट्यूब और नेटफ्लिक्स जैसी ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग सेवाओं के लिए औसत वार्षिक मूल्य करीब 81 हजार (1173 डॉलर) रखा। अध्ययन से यह भी पता चला है कि उपभोक्ता प्रति वर्ष औसतन 12 लाख (17,530 डॉलर) रुपए सर्च इंजन पर और 58 हजार (8414 डॉलर)रुपए ईमेल का मूल्य रखा।

 

वहीं विशिष्ट कंपनियों और उत्पादों के बारे में सर्वेक्षण में सामने आया कि जो उपभोक्ता यूट्यूब या इंस्टाग्राम का उपयोग करते हैं वे फेसबुक की कम कीमत आंकते हैं। ऐसे ही महिलाएं फेसबुक पर पुरुषों की तुलना में अधिक मूल्य मानती हैं। जबकि निम्न आय और उच्च आय वर्ग वाले लोगों की तुलना में मध्यम वर्ग के लोगों ने फेसबुक को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया। शोध के इन निष्कर्षों के आधार पर निश्चित रूप से जीडीपी में बदलाव और सुधार के बारे में सोचने के पर्याप्त कारण हैं।

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