गुलाबीनगरी की पहचान हैं ये प्रमुख गणेश मंदिर, हर मंदिर का अलग है इतिहास

Mridula Sharma

Publish: Sep, 12 2018 04:43:29 PM (IST)

Jaipur, Rajasthan, India
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- नहर के गणेशजी
स्थान- ब्रह्मपुरी पावर हाउस के पास बाइपास रोड
क्यों पड़ा नाम- पहाड़ी की तलहटी में होने के कारण बारिश का पानी मंदिर के सामने से नहर के रूप में बहता था, इसीलिए नहर वाले गणेशजी कहलाए।
स्थापना- मंदिर महंत रामेश्वर लाल शर्मा के अनुसार दो सौ वर्ष पूर्व बाबा हरिशंकर महाराज व व्यास पण्डित रामचन्द्र ने करवाई।
खासियत- दाहिनी सूण्ड और दक्षिणाभिमुख की विशाल दुर्लभ प्रतिमा सिद्धासन में विराजमान है, अप्रत्यक्ष रूप से रिद्धि-सिद्धि माला और मोदक के रूप में विराजमान हंै, प्रतिमा की दो भुजाओं में अकुंश और परशु होते हुए भी दोनों हाथ वरद हस्त हैं।

जयपुर. प्रथम पूज्य गणेशजी का जन्मोत्सव गुरुवार को पूरे देशभर में हर्षोल्लास से मनाया जाएगा। राजधानी में भी इसके लिए विशेष तैयारियां कर ली गई हैं। शहर के प्रमुख मंदिरों में तीन दिवसीय महोत्सव शुरू हो चुका है। बुधवार को गजानन को मेहंदी अर्पित कर सिंजारा मनाया जाएगा। जयपुर शहर में वैसे तो सैकड़ों गणेश मंदिर हैं, लेकिन कुछ गणेश मंदिरों की मान्यता ज्यादा है और रोजाना यहां श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा रहता है। हर मंदिर का अलग स्वरूप और स्थान ही उनकी इस मान्यता को बढ़ा रहा है। आइए जानते हैं शहर के प्रमुख गणेश मंदिरों के बारे में...

 

- श्रीसिद्धि विनायक मंदिर
स्थान - सूरजपोल बाजार
क्यों पड़ा नाम- इस मंदिर में गणपति रिद्धि और सिद्धि की चवंर ढुलाती मूर्तियों के बीच स्थापित हैं और इनके नायक होने से यह सिद्धि विनायक कहलाए।
स्थापना- मंदिर प्रन्यासी पं. मोहनलाल शर्मा के अनुसार महाराजा सवाई जयसिंह की जयपुर की स्थापना के समय शहर के मुख्य मार्गों पर बसाए गए मंदिरों की अनवरत शृंखला की एक कड़ी में ही इस मंदिर का निर्माण हुआ।
खासियत- श्वेत गणपति की प्रतिमा के शरीर पर सर्पाकार यज्ञोपवीत है। चारों हाथों और दोनों पैरों में भी सर्प के बंधेज हैं, तांत्रिक प्रतिष्ठा के परिचायक, सूर्य की सीधी किरणें गणेशजी का प्रतिदिन मंगल अभिषेक करती है, प्रत्येक बुधवार को मणों दूध से अभिषेक किया जाता है


-श्वेत आक के गणेश जी
स्थान- जयपुर की पुरानी राजधानी आमेर में
क्यों पड़ा नाम- गणेश की यह प्रतिमा सफेद आंकड़े से निकली हुई है। मन्दिर के सेवक चन्द्रमोहन ने बताया कि श्वेत आक की ऐसी ही एक मूर्ति पुष्कर में भी है।
स्थापना- इस दुर्लभ प्रतिमा को आमेर के महाराजा मानसिंह प्रथम हस्तिनापुर से लाए थे। मन्दिर पुजारी निरंजन कुमार याज्ञनिक ने बताया कि इस मन्दिर की प्रतिमा को महाराजा मानसिंह प्रथम जयपुर की स्थापना के पहले हिसार (हस्तिनापुर) से लाए थे। इस मूर्ति को वापस मंगाने के लिए हिसार के राजा ने आमेर में अपने घुड़सवारों को भेजा था। महाराजा ने श्वेत आक गणेश के पास ही पाषाण की दूसरी मूर्ति बनवा कर रख दी। जिससे घुड़सवार आश्चर्य चकित हो गए और वे दोनों मूर्तियां यहीं छोड़ गए। तभी से ये दोनों प्रतिमाएं बावड़ी पर स्थित है।
खासियत- आमेर के इस मंदिर में श्वेत आक की प्रतिमा के नीचे पाषाण की गणेश मूर्ति भी स्थापित है। पूर्व दिशा को देखती हुई दोनों मूर्तियों गणेशजी की बांई सूंड हैं। इसलिए इसे सूर्यमुखी गणेश भी कहते है। महाराजा मानसिंह प्रथम ने यहां 18 स्तम्भों का मंदिर बनवाकर गणेश को विराजमान करवाया था। अनेक भक्त जो यहां नहीं पहुंच पाते वे विवाह आदि के निमंत्रण पत्र डाक या कोरियर से यहां भेजते हैं। गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहां मेला भरता है और आमेर कुण्डा स्थित गणेश मन्दिर से शोभायात्रा निकाली जाती है जिसका समापन आंकड़े वाले गणेश जी पर होता है।


- झण्डे वाले गणेशजी
स्थान- बड़ी चौपड़ हवामहल के नीचे खंदे में विराजमान
क्यों पड़ा नाम- रियासतकाल के दौरान मंदिर पर 52 हाथ लम्बा ध्वज फहराता था। इस लिए इनका नाम झण्डेवाले या ध्वजाधीश गणेशजी पड़ा।
स्थापना- मंदिर महंत प्रदीप औदिच्य के अनुसार हवामहल की स्थापना के समय ही गणेशजी की स्थापना की गई।
खासियत- रियासतकाल के दौरान किसी भी दूसरे प्रदेश के राजा-महाराजाओं को अपने पक्ष में करने के लिए इस मंदिर के 52 हाथ लम्बे ध्वज के नीचे से निकाला जाता था।

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