शानदार नहीं, इंस्पिरेशनल है 'सुपर 30'

शानदार नहीं, इंस्पिरेशनल है 'सुपर 30'

Aryan Sharma | Publish: Jul, 12 2019 02:28:07 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

सुपर 30' का फर्स्ट हाफ बहुत ही शानदार है, लेकिन सेकंड हाफ में फिल्म बिखर जाती है। इमोशनल सीन और ॠतिक रोशन की जबरदस्त परफॉर्मेंस के कारण फिल्म गणितीय समीकरणों की तरह रोचक जरूर है।

डायरेक्शन: विकास बहल
राइटिंग: संजीव दत्ता
म्यूजिक-बैकग्राउंड स्कोर: अजय-अतुल
सिनेमैटोग्राफी: अनय गोस्वामी
डिटिंग: ए. श्रीकर प्रसाद
रनिंग टाइम: 154 मिनट
स्टार कास्ट: ऋतिक रोशन, मृणाल ठाकुर, नंदीश सिंह, पंकज त्रिपाठी, वीरेंद्र सक्सेना, आदित्य श्रीवास्तव, अमित साध, मानव गोहिल, राजेश शर्मा, अली हाजी, करिश्मा शर्मा

आर्यन शर्मा/जयपुर. गणित के टीचर आनंद कुमार सुपर 30 एजुकेशन प्रोग्राम के जरिए इकोनॉमिकली अंडरप्रिवलेज्ड, पर टैलेंटेड स्टूडेंट्स को आईआईटी में एडमिशन के लिए होने वाले एंट्रेंस एग्जाम जेईई की कोचिंग देते हैं। आनंद की लाइफ से प्रेरित फिल्म 'सुपर 30' में निर्देशक विकास बहल ने उनके संघर्ष को दर्शाया है, लेकिन वह फिल्म से पूरी तरह से न्याय नहीं कर पाए। जिस अंदाज में फिल्म का आगाज होता है, वह अंजाम तक पहुंचते-पहुंचते थोड़ा गुम सा हो जाता है। कहानी में आनंद कुमार (ऋतिक रोशन) गणित विषय को लेकर जुनूनी है और वह इतना टैलेंटेड है कि उसे शिक्षा मंत्री के हाथों सम्मानित होने का मौका मिलता है। गणित के जटिल सवालों को वह आसानी से हल कर सकता है। इसी टैलेंट की बदौलत उसे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिल जाता है, पर पोस्टमैन की नौकरी करने वाले उसके पिता आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण फीस नहीं भर पाते। इसी बीच अचानक उसके पिता का निधन हो जाता है। मजबूरी में वह पापड़ बेचने लगता है। एक दिन एक्सीलेंस कोचिंग सेंटर संचालक लल्लन सिंह की नजर उस पर पड़ती है। आनंद की प्रतिभा से वाकिफ लल्लन उसे कोचिंग में पढ़ाने का ऑफर देता है। आनंद वहां पढ़ाने लगता है तो लल्लन कोचिंग से पैसे कमाने में लग जाता है। आनंद भी उस माहौल में रम जाता है। तभी एक ऐसा वाकया होता है, जिससे आनंद को जिंदगी का नया मकसद मिल जाता है।
दूसरे हाफ में बिखर गया स्क्रीनप्ले
आनंद की कहानी में काफी संभावनाएं थी, पर मेकर्स ने कई जगह सिनेमैटिक लिबर्टी ली है, जिससे मूवी में दिखाए गए कई इंसिडेंट्स रीयल नहीं लगते। संजीव दत्ता का स्क्रीनप्ले पहले हाफ में एंगेजिंग है, पर सेकंड हाफ में ज्यादा नाटकीयता के कारण बीच-बीच में बिखर गया हैै। 'अब राजा का बेटा राजा नहीं बनता...वो बनता है जो हकदार होता है', 'आपत्ति से ही आविष्कार का जन्म होता है' जैसे कई डायलॉग्स असरदार हैं। 'क्वीन' फेम विकास का निर्देशन ठीक-ठाक है, जो बेहतर होता तो फिल्म सुपर्ब हो सकती थी। ऋतिक ने आनंद के संघर्ष को पर्दे पर जीने के लिए काफी मेहनत की है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और कॉस्ट्यूम कैरेक्टर से मेल खाते हैं। उनका बिहारी लहजा इंटरेस्टिंग है, लेकिन उनका डार्क स्किन टोन और आई कलर थोड़ा खटकता है। आनंद की लव इंटरेस्ट के रोल में मृणाल ठाकुर इम्प्रेसिव हैं। खल चरित्र में आदित्य श्रीवास्तव जंचते हैं। शिक्षा मंत्री की भूमिका में पंकज त्रिपाठी ओके हैं। वीरेंद्र सक्सेना व नंदीश सिंह की परफॉर्मेंस अच्छी है। विजय वर्मा, अमित साध समेत अन्य सपोर्टिंग कास्ट की एक्टिंग नैचुरल है। म्यूजिक बेअसर है। सिनेमैटोग्राफी सराहनीय है, पर एडिटिंग टाइट नहीं है।

क्यों देखें: 'सुपर 30' में एक बार फिर ऋतिक ने अपना कैलिबर दिखाया है। लेकिन जैसी मिसाल आनंद का सुपर 30 बना है, वैसा कमाल विकास की 'सुपर 30' नहीं दिखा पाती। फिर भी ऋतिक की परफॉर्मेंस व गणितीय समीकरणों की तरह रोचक आनंद की इंस्पिरेशनल स्टोरी के लिए एक बार देख सकते हैं 'सुपर 30'।
रेटिंग: 2.5 स्टार

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