आवासीय-व्यावसायिक के मिक्स पट्टे देने में जुटी सरकार!

राजस्थान सरकार की चारदीवारी और पुरानी बसावट के इलाकों पर नजर

By: Bhavnesh Gupta

Published: 27 Jun 2021, 11:45 PM IST

भवनेश गुप्ता
जयपुर। प्रशासन शहरों के संग अभियान में दस लाख पट्टे देने के लक्ष्य तय करने वाली राज्य सरकार की अपेक्षा बढ़ती जा रही है। सरकार की नज़र अब पुरानी बसावट (चारदीवारी) के क्षेत्रों में पट्टे देने पर टिक गई है। वर्षों से एक साथ चल रही आवासीय और व्यवसायिक गतिविधियों को देखते हुए यहां मिश्रित भू उपयोग ( मिक्स लैंड यूज) का पट्टा देने के विकल्प पर गंभीरता से मंथन कर रही है। अभी तह यहां पिछली भाजपा सरकार में कुछ को केवल आवासीय पट्टा जारी किया गया था और वह भी स्टेट ग्रांट एक्ट के तहत ही। कांग्रेस सरकार अब इससे एक कदम आगे जाकर मिश्रित भू उपयोग का सरकारी दस्तावेज देने की तैयारी कर रही है। हालांकि इसके लिए विधि विशेषज्ञ से राय ली जा रही है। क्योंकि ऐसी स्थिति में पुरानी बसावट के वैभव को कायम रखना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। सूत्रों के मुताबिक नगरीय विकास विभाग ऐस 35 लाख आवास मानता है और इनमें से 20 प्रतिशत भी सुलझे मामले मिलते हैं तो करीब 7 लाख आंकड़ा होता है। सरकार इस अभियान सफल बनाने के लिए पुरानी बसावट को 'गेमचेंजर' के रूप में देख रही है। यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल पिछले दिनों इसके संकेत दे चुके हैं। जयपुर में चारदीवारी के अलावा आमेर, सांगानेर के पुराने इलाके इसमें शामिल है।

भाजपा सरकार में जोड़ी धारा, कांग्रेस सरकार के लिए वरदान
पिछली भाजपा सरकार के समय वर्ष 2015 में नगरपालिका अधिनियम में नई धारा 69ए जोड़ी गई थी। इसके तहत संबंधित शहरी निकाय पुरानी आबादी क्षेत्र में वर्षों से रह रहे लोगों को पट्टे जारी कर सकते हैं। लेकिन भाजपा सरकार में ही इस धारा के तहत काफी कम संख्या में ही पट्टे जारी किए जा सके। अब कांग्रेस सरकार इसका फायदा उठाने की तैयारी में है।

अभी तक यह बंदिश
शहर की सबसे पुरानी आबादी में विकसित मकान का नियमन के लिए राजस्थान स्टेट ग्रांट एक्ट 1961 में बना। इसमें बंदिश है कि अधिकतम 300 वर्ग गज और आवासीय उपयोग के ही पट्टे दे सकते हैं। लेकिन पुरानी आबादी शहर का ज्यादातर हिस्सा मिश्रित रूप (नीचे दुकान- ऊपर मकान) में भी है।

दिक्कत : इसकी आड़ में बिगड़ेगा वैभव
हकीकत : सरकार भले ही मिश्रित भू उपयोग का पट्टा देने पर मंथन कर रही हो, लेकिन एक पहलू यह भी है मॉनिटरिंग के अभाव रहा तो पुराने शहर का वैभव गड़बड़ाने की आशंका भी बनी रहेगी।
दावा : अफसरों का दावा है कि पट्टा आवेदन मांगते समय भूखण्डधारी को बिल्डिंग प्लान देना होगा। यह बिल्डिंग प्लान को जीआईएस सेअटैच हो जाएगा। इसके बाद यदि वह बिल्डिंग बायलॉज के विपरीत निर्माण करता है तो उस पर ऑनलाइन नजर रखी जा सकेगी।नियम कायदों की धज्जियां उड़ा कर खड़ी की गई अवैध व्यवसायिक इमारतों का नियमन नहीं किया जाएगा। साथ ही गलियों के रास्तों में सड़क की भूमि पर किए अतिक्रमण का नियमन भी नहीं होगा।

यह है गणित
प्रदेश में 27 हज़ार वर्ग किलोमीटर शहरी क्षेत्र है। उसमें से एक चौथाई पुरानी आबादी का है। यानि, करीब 7000 वर्ग किलोमीटर। यहां औसतन 50 हज़ार व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर आंकड़ा है (हालांकि, जयपुर में यह एक लाख व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है)। इस तरह 35 लाख भूखंड मिश्रित भूपयोग के माने जा रहे हैं। इनके पास पट्टे नहीं है। अब स्वामित्व का पट्टा देना चाह रहे। हालांकि, 20 प्रतिशत का ही निस्तारण हो सकने की स्थिति बताई जा रही है।

अफसर यह दे रहे तर्क

-वर्षों से इंतज़ार कर रहे पुराने शहर के निवासियों को पट्टा मिलने पर भूमि के विवाद समाप्त होंगे
-क्रय विक्रय सम्भव होगा , पारिवारिक बंटवारा सम्भव हो सकेगा
- सरकारी पट्टा मिलने से सुरक्षा की भावना बढ़ेगी
-प्रॉपर्टी ट्रान्स्फ़र करना आसान होगा
-निर्माण स्वीकृति मिल पाएगी

Bhavnesh Gupta Reporting
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