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जयपुर

Paper Leak In India : पेपर लीक; सोचा-समझा देशद्रोह

दूसरी ओर शिक्षा नीति को आज भी अंग्रेजी चश्मे से देखा जाता है। प्रतियोगी परीक्षाएं भी ऐसी हैं जिससे परीक्षार्थी की समझ का आकलन नहीं हो पाता। ये परीक्षाएं रटने की प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देती हैं। परीक्षाओं में सवाल ऐसे क्यों नहीं किए जाएं जिससे इन परीक्षाओं में बैठने वालों की समझ का पता चल सके।

जयपुरJun 22, 2024 / 12:59 pm

जमील खान

गुलाब कोठारी

लक्ष्मी के पुजारी क्या-क्या नहीं कर डालते लक्ष्मी को घर में बांधने के लिए। किसी को भी मां के दूध की लाज नहीं आती। मां खुद तो लक्ष्मी दिखाई ही नहीं देती। आज तो मां को घर से निकालकर उसके कमरे में नोट भरने का जमाना आ गया है। सरकार किसी की भी हो, वातावरण एक जैसा है। किसी के व्यक्तित्व को गिराना हो, किसी को निकम्मा बनाना हो, अत्याचारी बनाना हो तो उसे सरकार में नौकरी लगा दो। वैसे तो नौकर अपने लिए जीता कहां है? सारी शिक्षा-जीवनकाल अन्य के आदेशों/निर्देशों की पालना में ही लगाता है। उसके लिए स्वतंत्रता कैसी! अधिकांश शासक वर्ग भी लक्ष्मी के पीछे ही दौड़ रहा है। शासक एवं नौकर का भेद भी समाप्त हो गया।
शिक्षा एवं स्वास्थ्य विभाग में जो पेपर-लीक के मामले बढ़ रहे हैं, वे नियोजित हैं। करोड़ों छात्रों का भविष्य दांव पर है। होगा, इनकी बला से। सड़कें-पुल दो महीने चलें, कोई मरे- इनकी बला से। नकली अंग प्रत्यारोपण-नकली दवाइयां – झूठे टेस्ट- झूठे क्लेम- कमीशनखोरी जैसे नैतिक मुद्दे बन गए आज।
कागज के टुकड़े बटोरने- माफिया का पेट भरने- जनता को पंगु बनाने के लिए ही सब जी-जान से जुटे हैं। लोकतंत्र के तीनों पाए बदनामी सुनकर सिर भले ही नीचा कर लें, अपने देशवासियों का सम्मान नहीं करेंगे। उनके धन से पेट पालते हैं, उनकी ही पीठ पर छुुरा घोंपते हैं। भले ही इनके खुद के बच्चे भी प्रभावित हों। पिछले पांच साल में पन्द्रह राज्यों में 41 से ज्यादा परीक्षाएं रद्द हुई हैं। लगभग डेढ़ करोड़ बच्च्चों का भविष्य प्रभावित हुआ है। कितने अधिकारी-नेता गुलछर्रे उड़ा रहे होंगे। यह हमारा लोकतंत्र है, हमारी चुनी हुई सरकारें हैं। हमारा ही गला घोंट रही हैं। अपनों को मूर्ख बनाकर ठगने में गर्व महसूस करते हैं। इतने बड़े घोटालों के बाद जांचें भी बैठी होंगी, कारण भी सामने आए होंगे। किसी को न सजा सुनाई गई न ही किसी को बर्खास्त किया गया। ये भी अंग्रेज ही निकले।
देश में कानूनों की कमी नहीं है। लोगों की कमी नहीं है। सरकारें रोज नए कानून लाती रहती हैं। उसके कर्मचारी- नौकर ही कानूनों की धज्जियां उड़ाते रहते हैं। केन्द्र सरकार का लोक परीक्षा- अनुचित साधन निवारण बिल- 2024 लोकसभा मेें पास हुआ था। कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देश भर में छात्रों के भविष्य से पेपर माफिया होली खेल रहा है।
जम्मू से आंध्र, गुजरात, महाराष्ट्र,असम चारों ओर त्राहि-त्राहि मची रहती है। सारी जांचें मिलकर भी इन परीक्षा लेने वालों के प्रति विश्वास पैदा नहीं कर पाईं। ठगी के आंकड़ों में राजस्थान सबसे आगे। रीट-2021, लाइब्रेरियन भर्ती परीक्षा, वरिष्ठ अध्यापक भर्ती परीक्षा, स्वास्थ्य सहायक संविदा भर्ती परीक्षा, पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा, कोर्ट एलडीसी भर्ती परीक्षा…बस गिनते जाओ।
स्पर्धा में सक्षम नहीं
क्या किसी को चिंता हुई कि पेपर-लीक क्यों होने लगे हैं? सरकारें जनता के कार्यों के प्रति उदासीन होने लगी हैं। कमीशनखोरी मुंह लग गई है।

नीट का पेपर लीक हुआ। तेईस लाख से ज्यादा बच्चे बैठे थे। उसका फैसला होने से पहले एनटीए की नेट परीक्षा रद्द कर दी गई। नौ लाख बच्चे थे। प्रतिक्रिया तो तीखी होनी ही थी। न स्वास्थ्य विभाग जागरूक है, न ही शिक्षा विभाग। दो घोड़ों की सवारी ऐसी ही होती है। सब मगरमच्छी आंसू बहाने वाले हैं।
जरा सोचिए! जहां गांवों में या तो स्कूल नहीं, या फिर अध्यापक नहीं, तब शिक्षा का रूप क्या होगा? भर्ती होने नहीं देंगे। देश भर में पाठॺक्रम भी मानो यूनीफॉर्म की तरह भिन्न-भिन्न, भाषाएं भिन्न-भिन्न। फिर केन्द्रीयकृत परीक्षाएं कैसे समानता की अपेक्षा रखती हैं। क्या इस देश का ग्रामीण-स्थानीय भाषा का छात्र, शहरी-ऊंचे कॉलेजों के बच्चों से स्पर्धा कर सकता है? क्या इसको ‘बेमेल विवाह’ नहीं कहेंगे? आज बड़े स्कूलों में स्वयं अध्यापक ट्यूशन पर जोर देकर अपनी आय बढ़ाने में लगे हैं। कौन रोक रहा है उनको? नगर-नगर में कोचिंग संस्थाओं की बाढ़ क्यों आ गई? क्योंकि सरकारी ढांचा चरमरा गया है। शिक्षण स्पर्धा करने में सक्षम नहीं है।
दूसरी ओर शिक्षा नीति को आज भी अंग्रेजी चश्मे से देखा जाता है। प्रतियोगी परीक्षाएं भी ऐसी हैं जिससे परीक्षार्थी की समझ का आकलन नहीं हो पाता। ये परीक्षाएं रटने की प्रवृत्ति को ही बढ़ावा देती हैं। परीक्षाओं में सवाल ऐसे क्यों नहीं किए जाएं जिससे इन परीक्षाओं में बैठने वालों की समझ का पता चल सके। सिर्फ नंबर देने के लिए ही परीक्षाएं क्यों? शिक्षा नीति के लिए वरिष्ठ शिक्षकों की समिति होनी चाहिए। पाठॺक्रम भी समिति के सदस्य ही सर्वसम्मति से तय करें। शिक्षा से जुड़े हर व्यक्ति का अलग से गुणवत्ता टेस्ट भी होना चाहिए। केवल वरिष्ठता का आधार ही उपयोगी नहीं है। परीक्षा क्षेत्र के लोगों का तो मनोवैज्ञानिक परीक्षण भी अनिवार्य होना चाहिए। शिक्षा मंत्री-सचिव जैसे पदों पर बैठे लोग भी आज दूध के धुले नहीं रहे। बड़ा लालच इनको भी फांस सकता है। शिक्षा एक पवित्र कार्य है, पूजा है। कोई अहंकार बीच में नहीं आना चाहिए। असुरों का धर्म नहीं होता। सरकारों का दृढ़ संकल्प कारगर हो सकता है। वरना बच्चे लुटते रहेंगे, पास होकर भी बेरोजगार घूमते रहेंगे। समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुका है। अध्यापकों-अधिकारियों-शोध ग्रंथों सभी की तो गुणवत्ता सवालों के घेरे में हैं। ऊपर से पेपर-लीक में इतना बड़ा धन, मानो लाटरी खुल गई। बड़ी सारी चुनौती है जिससे निपटने की शुरुआत गंभीर शिक्षा मंत्री, शिक्षा अधिकारी से लेकर सुदृढ़ ढांचे तक से करनी होगी।
-gulabkothari@epatrika.com

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