रेखा और नसीरुद्दीन की ‘इजाजत’ के तीस साल

Uma Mishra

Publish: Jul, 09 2019 07:21:28 PM (IST)

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर. गुलजार की ‘इजाजत’ एक रूहानी प्रेम कहानी की तरह सामने आती है, वो भी तब जबकि ये प्रेम तीन लोगों के बीच बंटा हुआ है। त्रिकोणीय प्रेम कथाओं में इतनी खूबसूरती कहां से आ गई! इसकी तह में जाते हैं, तो सुबोध घोष का नाम सामने आता है। बंगाली के इस मशहूर लेखक और पत्रकार ने हिंदी फिल्मों के लिए दो बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीता है। बिमल रॉय की ‘सुजाता’ और गुलजार की ‘इजाजत’ की कहानी उन्होंने ही लिखी। दोनों ही फिल्में कमाल की हैं, लेकिन अभी सिर्फ ‘इजाजत’ की बात।

 

तीन दशक हुए पूरे

रेखा, नसीरुद्दीन शाह और अनुराधा पटेल के जीवंत अभिनय से सजी इस फिल्म के तीन दशक पूरे हो चुके हैं। यह फिल्म 8 जुलाई, 1987 को रिलीज हुई थी। गुलजार को इस फिल्म की प्रेरणा बांग्ला मूवी ‘जतुगृह’ से मिली, जो इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी, जिसे सुबोध घोष ने लिखा था। अभिनेता उत्तम कुमार को यह कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसी नाम से फिल्म बनाने की सोची। फिल्म को तपन सिन्हा ने निर्देशित किया। बाद में गुलजार ने इस बेजोड़ कहानी को हिंदी सिनेमा में पेश किया या यूं कहें कि एक बांग्ला कविता का उन्होंने अद्भुत भावानुवाद किया।

 

मेरा कुछ सामान...

रेलवे के वेटिंग रूम से फिल्म शुरू होती है, तो यूं लगता है कि किसी खूबसूरत से स्टेशन तक इसे पहुंचना चाहिए। ये बांग्ला साहित्य की खूबसूरती ही है कि कहानी में दर्द हो, तब भी न जाने क्यों ये रूहानी सुकून दे जाती है। रूहानी सुकून इस मायने में भी कि यहां तीन किरदार जो प्रेम की अपनी चाह को पा नहीं सकते एक-दूजे की वजह से ही, फिर भी किसी में खामियां नहीं ढूंढ़ते। अपनी समझ और अपने हालात के संग वे जीवन में आगे बढ़ते हैं और एक रोज आगे बढऩे की ‘इजाजत’ मांग लेते हैं। और जब मांगते हैं, अपना कुछ सामान, तो आंखें नम हुए बिना रह नहीं पातीं।

 

सांद्र कहानी, तरल गाने

जाने-माने उद्घोषक और हिंदी गीतों पर बेहतर समझ रखने वाले यूनुस खान कहते हैं, ‘ भारतीय सिनेमा के इतिहास में ‘इजाजत’ बहुत मायने रखती हैं। मानवीय संबंधों की यह जटिल कहानी इतनी समझदारी से बुनी गई है कि ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नजर ही नहीं आता। दरअसल गुलजार ने इस फिल्म की प्रेरणा बांग्ला फिल्म ‘जतुगृह’ से ली, जिसे तपन सिन्हा ने निर्देशित किया था और उत्तम कुमार ने इसमें अभिनय किया था। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी भी बेहद खास है। ये फिल्म अपने संवादों के लिए भी याद की जाती है।’


वे कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि इजाजत मानवीय संबंधों की सांद्र कहानी है, इसके गाने हमें तरल बना देते हैं। ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है...’ बेहद ही मानीखेज गाना है, जिसमें गुलजार लिखते हैं- ‘एक सौ सोलह चांद की रातें एक तुम्हारे कांधे का तिल....’ इसके अलावा ‘कतरा कतरा मिलती है...’, ‘खाली हाथ शाम आई है...’ और ‘छोटी-सी कहानी से...’, ये बहुत महत्वपूर्ण गाने हैं। ‘मेरा कुछ सामान...’ के लिए गुलजार को नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला था। इस गाने के लिए उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला था। अगर आपने यह फिल्म नहीं देखी तो इसे जरूर देखा जाना चाहिए।

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