कैसे हो शिशुओं का सही विकास, प्रसूताओं की प्रसव पूर्व देखभाल में पिछड़ा राजस्थान

कैसे हो शिशुओं का सही विकास, प्रसूताओं की प्रसव पूर्व देखभाल में पिछड़ा राजस्थान

Deepshikha | Updated: 14 May 2019, 02:45:49 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

स्वास्थ्य सूचकांक : देश के सूचकांक से निचले पायदान में राजस्थान सहित 11 राज्य शामिल

विकास जैन / जयपुर. मातृ व शिशु मृत्यु दर सहित कई अन्य स्वास्थ्य सूचकांकों में निचले पायदानों पर रहा राजस्थान प्रसव से पूर्व माताओं की देखभाल में भी देश के सूचकांक से काफी पीछे है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 4 के अनुसार देश में यह प्रतिशत बढ़कर 51 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया है। 14 साल पहले एनएफएचएस 3 के समय 37 प्रतिशत दर्ज किया गया था। जबकि राजस्थान अब भी 38.5 प्रतिशत तक ही पहुंच पाया है।

देश के सूचकांक से निचले पायदान में राजस्थान सहित 11 राज्य शामिल हैं। इनमें मेघालय, असम, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, उत्तरप्रदेश, नगालैंड और बिहार शामिल हैं। देश में अंडमान निकोबार द्वीप समूह 92.1 प्रतिशत के साथ सबसे बेहतर स्थिति में है। बिहार 14.4 प्रतिशत के साथ सबसे खराब स्थिति वाला राज्य है। सर्वे में देखा गया कि गर्भवती महिला प्रसव से पहले कितनी बार प्रसव पूर्व जांच या परामर्श के लिए अस्पताल पहुंची। प्रसव पूर्व देखभाल का मुख्य उद्देश्य मां व गर्भस्थ शिशु दोनों के स्वास्थ्य, विकास व पोषण पर नजर रखना है।


प्रसव पूर्व देखभाल की समय अवधि

- 04 से 28 सप्ताह तक प्रति माह एक दौरा
- 28 से 36 सप्ताह प्रति माह दो दौरे
- 36 सप्ताह से बच्चे के जन्म तक प्रति सप्ताह एक दौरा
- उच्च जोखिम में शामिल महिलाओं जिनके मधुमेह, बीपी या अन्य पुरानी बीमारियां हैं, उनके लिए डॉक्टर अस्प्ताल विजिट के शिड्यूल को संशोधित भी कर सकती हैं


(शिशु रोग विशेषज्ञ व जेके लोन अस्पताल अधीक्षक डॉ. अशोक गुप्ता के अनुसार प्रसव पूर्व सही तरीके से हुई देखभाल से जन्म के बाद शिशु के शारीरिक विकास पर बेहतर प्रभाव पड़ता है)


पिछडऩे के बड़े कारण

- ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सर्व सुविधा युक्त अस्पताल नहीं
- अत्यंत छोटे गांव-ढाणियों में अस्पताल उपलब्ध भी हैं तो वहां स्त्री रोग विशेषज्ञ नहीं हैं
- राजस्थान में आज भी संस्थागत प्रसव 100 प्रतिशत नहीं हैं

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