उद्योग कैसे पकड़े रफ्तार, जब बंद है खपत का बाजार

जयपुर. लॉकडाउन के बीच सरकार भले ही उद्योगों को संजीवनी देने के लिए लगातार गाइडलाइन में संशोधन कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि कई जमीनी समस्याओं ने अब भी फैक्ट्री संचालकों को जकड़ रखा है। इसमें श्रमिकों की उपलब्धता नहीं होने के बाद दूसरा बड़ा कारण उत्पादन और खपत के बीच गहराने वाला अंतर है। विषय विशेषज्ञों के मुताबिक फैक्ट्री संचालक जैसे-तैसे उत्पादन शुरू भी कर दें, लेकिन उसकी खपत का बाजार (रिटेल मार्केट) ही बंद है। ऐसे में प्रोडक्ट को फैक्ट्री में ही ढेर लगाकर रखना होगा। इससे बाजार की अस्थिरता से

By: Sudhir Bile Bhatnagar

Published: 05 May 2020, 04:36 PM IST

समस्या: म्यूनिसिपल इलाके में रीको क्षेत्र के अलावा अन्य फैक्र्टी संचालन की अनुमति नहीं। इससे वृहद स्तर की गई बड़े उद्योगों का संचालन शुरू नहीं हो सका है। इनमें कच्चा माल उत्पादन की फैक्ट्री भी है। कच्चा माल नहीं मिलने के कारण अनुमत फैक्ट्रियां भी शुरू नहीं हो पा रही।
समाधान: ऐसी फैक्ट्रियों के संचालन के दौरान मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी रीको, उद्योग विभाग या फिर स्थानीय जिला प्रशासन को दे सकते हैं। गाइडलाइन की पालना सुनिश्चित करने का काम हो सकेगा।
समस्या: फैक्ट्री संचालक उत्पादन तो कर लेंगे, लेकिन उनकी चिंता है कि इसकी खपत कहां करेंगे, क्योंकि सप्लाई चेन में दुकानें बंद हैं। ऐसे में उत्पादन लागत भी फंसेगी और बाजार में खरीद-विक्रय दर की अस्थिरता भी
बनी रहेगी।
समाधान : ऑड-ईवन फॉर्मूला या फिर उत्पाद के आधार पर दुकानें खोलने का दिन तय करने पर मंथन हो सकता है। शुरुआत अन्य जरूरी उत्पादों से भी हो सकती है, जिनकी बाजार में खपत ज्यादा होती है। दिल्ली में इसी फॉर्मूले पर काम चल रहा है।
समस्या: फैक्ट्री संचालन व उत्पादन के लिए पहले का लोन चुकाना और अब नए सिरे से उत्पादन शुरू करने की बंदिश। ऐसे में फिलहाल बाजार में जरूरत के अनुरूप रोकड़ की उपलब्धता नहीं है।
समाधान: लोन की ईएमआइ छह माह से एक साल तक स्थगित कर सकते हैं और अब उद्योग संचालन के लिए नया लोन कम से कम ब्याज दर पर उपलब्ध कराकर उद्योगों को गति दी जा सकती है।
श्रमिकों को दोबारा बुलाना चुनौती
&श्रमिकों को बाहर भेजने के बाद, इन्हें दोबारा बुलाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। राज्य सरकार ने लॉकडाउन की अवधि में किसी भी श्रमिक का वेतन नहीं काटने, नौकरी से नहीं निकालने के लिए निर्देश दिए, लेकिन स्थिति अलग है। आर्थिक पैकेज के बगैर मजूदर काम पर नहीं लौट पाएंगे। सरकार श्रम संगठनों से प्रभावी संवाद करे। केंद्र सरकार ने जो पैकेज जारी किया उसमें भी कई खामियां हैं।-रवीन्द्र शुक्ला, प्रदेशाध्यक्ष, भारतीय ट्रेड यूनियन केन्द्र सीटू
&वर्तमान में वैसे ही लेबर की कमी के कारण कारखाने बहुत कम चल रहे हैं। यदि ये थोड़ी सी लेबर भी चली गई तो भविष्य में जरूरी वस्तुओं की क्राइसिस पैदा हो सकती है। कोविड-19 के चलते वैसे ही तीन-चार श्रमिक तो थर्मामीटर से बुखार नापने, सेनिटाइजर से हैंड वाश कराने एवं सोशल डिस्टेंसिंग आदि का ध्यान रखने जैसे कार्य में व्यस्त हो गए हैं-मनोज मुरारका, निदेशक, मणिशंकर ऑयल्स
&गारमेंट उद्योग न केवल कुशल रोजगार से जुड़ा हुआ है, बल्कि सबसे ज्यादा टैक्स रिटर्न भरने वाले उद्योगों में से है। अब तक गारमेंट उद्योग ने कुछ मांगा नहीं, लेकिन अब जरूरत है तो सरकार को आगे आना चाहिए। ब्याज मुक्त लोन मिले और मौजूदा लोन राशि पर कम से कम तीन से चार माह का ब्याज माफ हो। उत्पादन, मांग और खपत के बीच सामंजस्य बैठाना होगा।-जाकिर हुसैन, एग्जक्यूटिव सदस्य, गारमेंट एक्सपोर्टर एसोसिएशन (कॉटफैब)

Sudhir Bile Bhatnagar
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