गहलोत-पायलट को गले मिलवाकर राहुल ने दिया 'एकता' का सन्देश, पर नेतृत्व पर सस्पेंस अब भी बरकरार

गहलोत-पायलट को गले मिलवाकर राहुल ने दिया 'एकता' का सन्देश, पर नेतृत्व पर सस्पेंस अब भी बरकरार

Nakul Devarshi | Publish: Aug, 12 2018 03:09:46 PM (IST) | Updated: Aug, 12 2018 03:11:01 PM (IST) Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जयपुर के रामलीला मैदान में राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत व प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट को गले क्यों मिलवाया? कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे ने राहुल के पास लगी अपनी कुर्सी गहलोत के लिए खाली क्यों की? राहुल का रोड क्या कांग्रेस में उठ रहे नेतृत्व के सवाल को जाजम के नीचे दबाकर रख सकेगा? ये तमाम सवाल है जिनपर अब चर्चाएं शुरू हो गईं हैं।

 

वैसे कहते हैं न कि गले मिलते ही शिकवे शिकायत दूर हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही नजारा शनिवार की शाम जयपुर के रामलीला मैदान में नजर आया जब राजस्थान की कांग्रेसी राजनीति के दो ध्रुव राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के इशारे पर न सिर्फ गले मिले, बल्कि खिलखिलाए भी। लेकिन इस 'हग पॉलिटिक्स' ने चुनावी साल में कांग्रेस की नींद उड़ा रहे उस सवाल को अनुत्तरित ही रखा है कि कांग्रेस विधानसभा चुनाव जीती तो सत्ता की कमान किसे सौंपी जाएगी।

 

दरअसल, नेतृत्व का सवाल पिछले कई महीनों से कांग्रेस को सहमा रहा है। फिर इसे लेकर नेताओं की बयानबाजी ने आग में घी का काम किया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत के समर्थन में एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का बयान आया, फिर खुद गहलोत बोले कि राजस्थान की जनता ने दस साल तक चेहरा देखा है। इसका कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने अंदाज में जवाब भी दिया। हालांकि दोनों ही नेता यह बात दोहराते रहे हैं कि नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेस में कोई विवाद नहीं है। जो तय करेगा आलाकमान ही तय करेगा।

 

लेकिन जैसे जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं नेतृत्व का सवाल और गहरा होता जा रहा है। इसी बीच, राहुल की जयपुर यात्रा ने नेतृत्व के मुद्दे पर पूर्ण विराम लगाने की कोशिश की। राहुल शनिवार को जयपुर यात्रा पर थे। उन्होंने एयरपोर्ट से रामलीला मैदान तक करीब 3 घंटे रोड शो किया। रामलीला मैदान में भाषण दिया। भाषण में हालांकि राजस्थान नदारद रहा, लेकिन राजस्थान की तस्वीर जरूर राहुल के जेहन में रही होगी।

 

इसी वजह से भाषण खत्म करते ही राहुल गहलोत और पायलट के पास आए, दोनों से हाथ मिलवाए, दोनों गले मिले। मंच पर ही खिलखिलाए और ये ही तस्वीर कांग्रेस की राजनीति की नई इबारत लिखती नजर आई।

 

दरअसल कांग्रेस को लगता है कि प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी का फायदा उसे विधानसभा चुनाव में मिलेगा। हर पांच साल बाद सत्ता बदलने की राज्य की राजनीतिक परम्परा कायम रहेगी। लेकिन चुनाव से पहले गहलोत के राष्ट्रीय राजनीति में चले जाने के बाद प्रदेश में नेतृत्व का सवाल गहराने लगा है।

 

सचिन पायलट की प्रदेशाध्यक्ष के रूप में पारी सफल रही है। उनके नेतृत्व में न सिर्फ स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा, पार्टी ने उप चुनाव जीते। इसी साल हुए दो लोकसभा व एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली और तीनों उप चुनावों की सभी 27 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस ने भारी लीड हासिल की। ऐसे में पायलट समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने की कोशिश करते रहे हैं।

 

दूसरी ओर गहलोत का अपना जनाधार है, लोकप्रियता भी है। ऐसे में दोनों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लाजिमी नजर आती है और इसी प्रतिस्पर्धा ने कांग्रेस नेतृत्व को भी सहमा रखा है। जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी ने दोनों को गले मिलवा कर सार्वजनिक मंच से संदेश देने की कोशिश की है कि दोनों नेताओं का अपना महत्व है। नेतृत्व का सवाल आज की तारीख में गौण हो जाता है।

 

ये वो सवाल हैं जिनके जवाबों का इंतजार कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को भी है। मंच पर एक दूसरे के गले में हाथ डालकर कर मुस्कुरा रहे गहलोत व पायलट की तस्वीर की चर्चा है। सियासी पंडित हालांकि मान रहे हैं कि राहुल ने इस तस्वीर के पीछे प्रदेश में कोई गुटबाजी नहीं होने का संदेश दिया है। यह जताने की कोशिश की गई है कि कांग्रेस एकजुटता के साथ चुनाव लड़ेगी। नेतृत्व कोई मुद्दा नहीं है।

 

इधर, गले मिल रहे गहलोत व पायलट भले ही सार्वजनिक रूप से गुटबाजी या एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा से इनकार कर चुके हैं, लेकिन गहलोत का बार बार यह कहना कि ''म्हैं थ्हासूं दूर नहीं'' और पायलट का वही होगा जो आलाकमान चाहेगा वाला बयान बताता है कि अंदरूनी तौर पर कुछ न कुछ तो है। अब राहुल की हग पॉलिटिक्स इस पर कितना विराम लगा पाएगी, ये तो समय ही बताएगा।

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