दुर्लभ बीमारी के इलाज की आस में चल बसी मासूम, अब भाई पीड़ित

दुर्लभ बीमारी के इलाज की आस में चल बसी मासूम, अब भाई पीड़ित

neha soni | Updated: 07 Feb 2019, 12:14:31 PM (IST) Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

दुर्लभ गौचर बीमारी लाई चूरू के टैम्पो चालक पिता के लिए आफत, 3-9 लाख तक है इलाज का मासिक खर्च, जिन्दगी भर चलता है उपचार

जयपुर. दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी गौचर से 21 माह की बेटी इकरा को खो चुके चूरू के टेंपो चालक जमील अब 3 साल के बेटे सरफराज को बचाने के लिए अस्पतालों, डॉक्टरों और सरकार के नुमाइंदों के यहां भटक रहे हैं। इलाज नहीं होने से आंखों के सामने दम तोड़ती मासूम बेटी को देख चुके जमील बेटे का चेहरा देखकर ही रो पड़ते हैं। इस जानलेवा बीमारी में उपचार के लिए एंजाइम रिप्लेसमेंट थैरेपी (ईआरटी) की जरूरत पड़ती है, जिसमें एक बच्चे के लिए मासिक खर्च 3 से 10 लाख रुपए बैठता है, जो जीवन भर चलता है। अभी तक प्रदेश में इसका उपचार बीपीएल तक के लिए भी सरकारी अस्पताल तक में निशुल्क उपलब्ध नहीं है।
इंजेक्शन पाना ही हुआ मुश्किल, आवेदन भी किया, पर नहीं मिली सहायता : जमीन के बच्चों में जब गौचर का पता चला, तब वे 6 महीने के थे। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें ईआरटी कराना होगा। उन्होंने दुर्लभ बीमारियों के उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति के तहत गठित स्टेट टेक्निकल कमेटी(एसटीसी) के पास आवेदन भी किया था, लेकिन उन्हें राशि नहीं मिली। राज्य सरकार से धन देने का अनुरोध किया, लेकिन कोई सहयोग नहीं मिला। इस देरी के कारण बेटी ने जीवन खो दिया और अब उन्हें नहीं पता कि आगे क्या करना है और किसके पास जाना है।
प्रदेश में गठित है एसटीसी, पर नहीं मिल पा रही सहायता : दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति के तहत, राज्यों को आवेदनों को प्रोसेस करने और इन आवेदनों को धन के उचित आवंटन के लिए केंद्र के पास भेजने के लिए एसटीसी का गठन करना था।

राज्य व केन्द्र सरकार की ओर से हो सकती है गरीब की मदद, मगर टरका रहे
3-9 लाख तक है इलाज का मासिक खर्च, जिन्दगी भर चलता है उपचार

डॉक्टरों ने कहा सरकार तत्काल उपाय करे
शिशु उदर रोग विशेषज्ञ ललित भराडिया के अनुसार बच्ची के उपचार के लिए तत्काल सिफारिश की गई। परिजनों ने एसटीसी में आवेदन किया लेकिन कुछ नहीं हुआ। बाद में बच्ची का निधन हो गया। अब भाई की तिल्ली हटाने की सर्जरी हुई है। उसकी स्थिति खराब हो गई है। सरकार तत्काल उपाय करे, ताकि उस बच्चे और उसके जैसा किसी दूसरे मरीज को इस तरह की तकलीफ न उठानी पड़े।

इस तरह भारी है खर्चा
इस बीमारी में 30 किलो के बच्चे का महीने का खर्र्च करीब 9 लाख रुपए आता है। 10 किलो वजन है तो मासिक 3 लाख रुपए खर्च बैठता है। प्रदेश में इस समय भी करीब 50 बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें तत्काल उपचार शुरू करवाने की आवश्यकता है। इसके लिए गठित कमेटी आवेदन की जांच करती है, राज्य सरकार के पास आवेदन जाता है, वहीं से राशि अप्रूव होती है।

यह है बीमारी: अंगों में जम जाती है चिकनाई, कम उम्र में मौत
गौचर संक्रमित प्रकृति का आनुवंशिक रोग है, जिसमें यकृत, फेफड़ों, हड्डियों और कभी-कभी मस्तिष्क में बहुत अधिक वसा युक्त पदार्थ जमा हो जाते हैं। ग्लूकोसेरब्रोसिडेस एंजाइम की अपर्याप्तता के कारण रोग विकसित होता है। बीमारी में स्प्लीन और लीवर काफी बढ़ जाते हैं। हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, अकडऩे लगती हैं, मामूली चोट से भी टूट जाती हैं। समय पर उपचार नहीं मिलने पर यह कम उम्र में विकलांगता या मौत का कारण हो सकता है।

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