विकलांगता नहीं, सकारात्मकता के साथ जीते हैं निक-International Day of Persons with Disabilities

जयपुर। दुनियाभर में कई लोग हैं, जो विकलांगता को जिंदगी में कई पीछे छोड़ आगे बढ़ गए हैं। इतना कि यह कमी उनकी सकारात्मकता के कई नीचे दबी रह जाती है और वे अपने मुस्कुराते चेहरे से दुनिया से कहते हैं कि हमदर्दी नहीं चाहिए, हम खुद आपमें जिंदगी भर देंगे.... ऐसे ही है निकोलस जेम्स व्यूजेसिक... International Day of Persons with Disabilities पर जानते हैं उनके बारे में

By: Tasneem Khan

Published: 03 Dec 2019, 03:59 PM IST

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर। निकोलस जेम्स व्यूजेसिक, दुनियाभर के लिए एक ऐसा नाम जिसने विकलांगता की परिभाषा और जिंदगी दोनों ही बदल दी। उन्हें देख कोई भी अपना एक हाथ या एक पैर नहीं की शिकायत करने वाला चुप हो जाता है। फिर एक सकारात्मकता मिलती है उसे निक को देखकर। निक जब मुस्कुराते हैं तो कितनी ही जिंदगियों में जीवन मुस्कुराने लगता है। क्योंकि दोनों हाथ, दोनों पैर न होने के बाद भी निक के लिए यह शारीरिक कमी दुखी होने का कारण नहीं हो सकती। 37 वर्षीय निक कमियों से हारने वाले या इसके लिए भगवान को दोष देते रहने वालों के लिए बड़ा आदर्श बनकर उभरे हैं। आपको बता दें कि 4 दिसंबर 1982 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में निक का जन्म हुआ। दुनियाभर में करोड़ों में से कोई एक बच्चा होकोमेलिया नामक बीमारी से ग्रसित जन्म लेता है और निक उन्हीं से से एक थे। यानी जन्म से ही उनके दोनों हाथ और दोनों पैर नहीं थे। उनके पैर की जगह पर एक छोटा-सा पंजा था और आज इसी पंजे के दम पर वे तैर भी लेते हैं, गोल्फ भी खेल लेते हैं और फुटबॉल भी खेल लेते हैं। हैरानी की इसमें कोई बात नहीं है, क्योंकि निक ने साबित किया है कि उम्मीद छोड़ना, हाथ—पैरों से विकलांग होने से कई ज्यादा बुरा होता है।
हालांकि उम्मीद तो उनके माता—पिता को भी कभी नहीं थी कि निक एक दिन दुनिया के लिए आदर्श बनेगा। जब वो इस तरह पैदा हुआ तो उनके पेरेंट्स निराशा से भर गए थे। उनकी मां ने खुद बताया था कि उन्होंने निक को उसके जन्म के 4 महीने बाद गोद में लिया था। निक की मां नर्स थीं और निक की शारीरिक कमी के लिए खुद को ही दोषी मानती थीं। निक की जिंदगी के शुरुआती दिन निक और पेरेंट्स दोनों के लिए बहुत मुश्किल वाले थे| रोजाना के काम से लेकर पढ़ाई-लिखाई तक में दिक्कतें आया करती।
और बाद में पेरेंट्स ने ऐसा सपोर्ट सिस्टम खड़ा किया कि वे आगे बढ़ते रहे। सबसे पहले तो पेरेंट्स ने उन्हें स्पेशल स्कूल भेजने की बजाय नॉर्मल बच्चों के साथ ही पढ़ाई करवाई। हालांकि इस दौरान निक कई बार बुलिंग का शिकार भी हुए। निक उस वक्त करीब 6 साल के थे। तब नर्स मां ने प्लास्टिक का एक स्पेशल डिवाइस बनाया, जिसकी मदद से निक को पेन और पेंसिल पकड़ना सिखाया। वहीं उनके पिता कंप्यूटर प्रोग्रामर थे। 18 महीने की उम्र में वे निक को पानी में छोड़ देते थे ताकि वह तैरना सीख सकें। उन्होंने निक को पंजे की मदद से कम्प्यूटर पर टाइप करना सिखाया। यहां से उनमें आत्मविश्वास आने लगा। फिर निक ने फुटबॉल और गोल्फ खेलना सीखा। धीरे-धीरे स्वीमिंग और सर्फिंग भी सीख ली। पंजे की मदद से वह शरीर को बैलेंस करते हैं और यही पंजा किक लगाने में मदद करता है। इसी छोटे-से पंजे से वह लिखते और टाइप भी करते हैं।

इसी तरह से 17 साल की उम्र में उन्होंने प्रेयर ग्रुप्स में जाकर लेक्चर देना शुरू किया। 21 साल की उम्र में उन्होंने अकाउंटिंग और फाइनैंस में ग्रैजुएशन कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर अपना करियर शुरू किया। निक ने 'एटिट्यूड इज एटिट्यूड' नाम से कंपनी बनाई। वे 'लाइफ विदआउट लिंब्स' नामक एनजीओ भी चला रहे हैं। धीरे-धीरे उन्हें दुनिया में ऐसे मोटिवेशन स्पीकर के तौर पर जाना जाने लगा। उनकी सकारात्मकता को देख ही केनिया मियाहरा ने 2007 में उनसे शादी की। आज निक दुनियाभर के देश घूम चुके हैं। निक कहते हैं कि आपके जीवन में कोई चमत्कार न हुआ हो तो आप खुद ही एक चमत्कार बन जाओ।
वाकई निक खुद चमत्कार है।

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned