जिंदगी इन्हें नहीं, ये बुनती हैं जिंदगी- international women's day 2020

आज हम इंटरनेशनल वीमन्स डे मना रहे हैं। महिलाओं को बधाई दे रहे हैं। महिलाओं के सशक्त होने के दावे कर रहे हैं। लेकिन आज भी हमारे समाज में उनका रहना इतना आसान नहीं। हम उस समाज का हिस्सा हैं, जहां 21वीं सदी में भी बेटियों के होने पर बहुओं को निकाल दिया जाता है। हां, वक्त इस तरह से बदला है कि यह निकाली जाने वाली महिलाएं अपने दम पर सशक्त होकर समाज को बदलने के लिए निकल पड़ी हैं।

By: Tasneem Khan

Published: 07 Mar 2020, 04:07 PM IST

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

JAIPUR आज हम इंटरनेशनल वीमन्स डे मना रहे हैं। महिलाओं को बधाई दे रहे हैं। महिलाओं के सशक्त होने के दावे कर रहे हैं। लेकिन आज भी हमारे समाज में उनका रहना इतना आसान नहीं। हम उस समाज का हिस्सा हैं, जहां 21वीं सदी में भी बेटियों के होने पर बहुओं को निकाल दिया जाता है। हां, वक्त इस तरह से बदला है कि यह निकाली जाने वाली महिलाएं अपने दम पर सशक्त होकर समाज को बदलने के लिए निकल पड़ी हैं। शहर में ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने अपनी पर्सनल लाइफ में काफी संघर्ष किए। घर से निकाली भी गई, लेकिन परेशान होने या मदद मांगने की बजाय, इन्होंने अपना खुद का रास्ता चुना। आज वे अपने और अपनी बेटियों के लिए मां भी हैं और पिता की भूमिका में भी हैं। अब वे सिर्फ खुद के लिए नहीं जीती, बल्कि समाज के लिए भी अपना योगदान दे रही हैं। अपनी बेटियां ही नहीं, हर बच्चे के चेहरे पर मुस्कान देखने के लिए सामाजिक कार्यों से जुड़ी हैं। ताकि वे दूसरों के संघर्षो को कुछ कम कर सकें और उन्हें एक बेहतर जिंदगी के लिए प्रेरित कर सकें। मिलते हैं ऐसी ही महिलाओं से...

ऐसी ही एक मां हैं प्रीति अग्रवाल। वे बताती हैं कि वे बचपन में साइकिल चलाने में भी डरा करती थी, घर से बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल था, लेकिन जिंदगी की कड़वाहटों ने उनके सभी डर मन से निकाल दिए। वे आज कार चलाती हैं और अपनी जिंदगी के लिए भी खुद मुश्किलें आसान करती हैं। प्रीति बताती हैं कि उनके पति और ससुराल वालों ने उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ दिया क्योंकि उन्होंने बेटी को जन्म दिया। दहेज के लिए तो वे प्रताड़ित की ही जाती थीं, लेकिन बेटी के जन्म के बाद से तो उन्होंने प्रीति और बेटी की ओर देखा ही नहीं। अपने ही घर से अलग कर दिए जाने का मलाल अब प्रीति को नहीं है। वो नई जिंदगी शुरू कर चुकी हैं। आज वो एक सफल एचआर प्रोफेशनल हैं, अपनी बेटी को बेहतर जिंदगी दे रही हैं। यही नहीं एक एनजीओ से वे सिर्फ इसलिए जुड़ी हैं, ताकि वे हर जिंदगी खुशियों से भर सकें। वे अपने संघर्षों से खुद को निखार रही हैं और दूसरों को भी। वो कहती हैं कि बेटी और पेरेंट्स का साथ उनके लिए काफी है।


दूसरी हैं नीलम विश्नोई। वो लेक्चरर हैं और अब सोशल एक्टिविस्ट भी। उनके जीवन संघर्ष भी वही हैं। वे बताती हैं कि उनकी बेटी स्पेशल चाइल्ड है। जब बेटी एक महीने की थी तो परिजनों ने बेटी को उनके पीहर पक्ष छोड़ आने के लिए कहा। लेकिन उन्होंने बेटी को छोड़ने की बजाय उन लोगों को छोड़ दिया, जो उनके बेटी पैदा करने पर नाराज थे। आज उनकी बेटी 19 साल की है और खुद एक सोशल एक्टिविस्ट भी है। अब मां और बेटी दोनों मिलकर स्पेशल चाइल्ड के लिए काम करती हैं। वे कहती हैं कि महिलाएं चाहे तो संघर्षों के बीच खुद को सबसे मजबूत बना सकती हैं। अकेलेपन से घबराने से बेहतर है, खुद के लिए और समाज के लिए जीने की कोशिश करें।

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