कहीं निजी हाथों में सौंपने की तैयारी तो नहीं

खेतड़ी कॉपर कॉम्पलेक्स को कई बार हुए बेचने के प्रयास

By: jagdish paraliya

Published: 09 Jun 2020, 05:22 PM IST

झुंझुनूं/खेतड़ीनगर. हर वर्ष 25 से 30 हजार टन शुद्ध तांबा, उवर्रक, रसायन व अन्य उत्पाद बनाने वाले खेतड़ी कॉपर कॉम्पलेक्स की दुर्दशा यों ही नहीं हुई। निजी हाथों में देने के लिए सुनियोजित तरीके से पूरा खेल खेला गया। बड़े उद्योगपतियों ने इसे खरीदने को कई बार प्रयास किए।
केन्द्र सरकार ने सबसे पहले 20 अक्टूबर 2000 को खेतड़ी कॉपर कॉम्पलेक्स को निजी हाथों में देने की तैयारी की। इसके लिए अनेक कम्पनियों को बुलाया गया। चार कम्पनियों ने इसमें विशेष रूचि दिखाई। एक कम्पनी स्वीट्जरलैण्ड की थी। दूसरी इंग्लैंड और अमरीका की संयुक्त कम्पनी थी। दो बड़ी कम्पनियां भारत की थी। भारत की दोनों कम्पनियों के मालिक मूलत: राजस्थान के हैं।
इसके बाद 31 जनवरी, 7 फरवरी और 10 फरवरी 2001 को निजी कम्पनियों के प्रतिनिधि मौका देखने के लिए खेतड़ीनगर आए। यहां उनका जोरदार विरोध हुआ। मजदूर संगठनों व अन्य संगठनों के विरोध को देखते हुए धारा 144 लगानी पड़ी। कई मजदूर नेताओं को गिरफ्तार किया गया। सरकार ने प्रतिनिधियों को मौका दिखाने के लिए सुबह नौ बजे से पहले का समय चुना। ताकि उस समय मजदूर कम मिले और विरोध नहीं हो।जोरदार विरोध को देखते हुए सरकार ने हाथ खींच लिए। 24 अगस्त 2001 को इस प्रक्रिया को रोक दिया गया। मामला ठंडे बस्ते में चला गया और खेतड़ी में शांति के साथ मशीनें फिर से तांबा उगलने लगी।
फिर 2002 में ए. फग्र्यूशन कम्पनी को इसका सलाहकार नियुक्त किया गया। सितम्बर 2003 को पूरे हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड (एचसीएल) को निजी हाथों में देने की तैयारी की गई। इसकी जानकारी जब मजदूर संगठनों को लगी, तो संगठनों ने एकजुट होकर सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ याचिका दायर कर दी। सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे दे दिया। इसके बाद केन्द्र में सरकार बदल गई। मामला नई सरकार के पास पहुंचा।
23 अगस्त 2006 को तत्कालीन केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि एचसीएल का रिस्ट्रक्चर किया जाएगा।

2017 में फिर प्रयास
सरकार ने वर्ष 2017 में फिर से सरकारी उपक्रमों को निजी हाथों में देने के लिए सूची तैयार की। इसमें भी एचसीएल को शामिल किया जा रहा था, लेकिन श्रमिक संगठनों के विरोध के बाद इस प्रक्रिया को भी रोक दिया गया।

मजदूर नेता बोले-विरोध नहीं करते तो सरकार कब की बेच चूकी होती
भारतीय मजदूर संघ के श्याम लाल सैनी व खेतड़ी ताम्बा श्रमिक संघ के बिडदूराम सैनी ने बताया कि केसीसी को कई बार बेचने का प्रयास किया गया। देशी के अलावा विदेशी कम्पानियों ने भी रूचि दिखाई, लेकिन मजदूर संगठनों के विरोध के कारण सरकार ऐसा नहीं कर पाई। एक बार तो निजीकरण के खिलाफ गिरफ्तारी भी दी।

jagdish paraliya
और पढ़े

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned