पोम्पे के लक्षणों की पहचान करना बहुत महत्वपूर्ण

Anil Chauchan

Publish: Apr, 17 2018 09:38:36 PM (IST)

Jaipur, Rajasthan, India
पोम्पे के लक्षणों की पहचान करना बहुत महत्वपूर्ण

पोम्पे के लक्षणों की पहचान करना बहुत महत्वपूर्ण...

पोम्पे के लक्षणों की पहचान करना बहुत महत्वपूर्ण

जयपुर
अंतरराष्ट्रीय पोम्पे दिवस के मौके पर विशेषज्ञों ने इस दुर्लभ बीमारी के लक्षणों को समझने व इसकी समय पर पहचान के साथ उपचार पर जोर दिया। पोम्पे लायसोसोमल स्टोरेज डिस्ऑर्डरस (एलएसडी) और लिंब ग्रिडल मॉस्कुलर डिस्ट्रोफी (एलजीएमडी) का प्रकार है, जो जेनेटिक दुर्लभ बीमारियों का गु्रप है। रोगियों में पोम्पे के लक्षण अलग-अलग दिखाई देते है, यही वजह है कि इस बीमारी की पहचान करना मुश्किल हो जाता है और इलाज में देरी होती है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि इसके लक्षणों की समय रहते पहचान हो ताकि इलाज के जरूरी कदम उठाए जा सके।


संतोकबा दुर्लभजी मेमोरियल अस्पताल के पीडियेट्रिक गैसट्रोइंटरोलोजिस्ट डॉ. ललित भराडिया ने बताया कि एलएसडी में पोम्पे बहुत आम बीमारी है जिसके मृत्युदर बहुत ज्यादा है। यह अनुवांशिक दुर्लभ बीमारी है, जो एसिड अल्फा ग्लूकोसीडेस (जीएए) या एसिड मालटास एंजाइम की कमी से होती है। इस एंजाइम की कमी से मांसपेशियों की कोशिकाओं में खास किस्म का शूगर बनने लगता है, जिससे मांसपेशियां कमजोर होने लगती है। बीमारी के लक्षण और गंभीरता इस बात पर निर्भर करती है कि यह बीमारी पहली बार किस उम्र में दिखाई देती है। उम्र के अनुसार पोम्पे को तीन कैटेगरी में विभाजित किया गया है जिनमें क्लासिक इनफेनटाइल, नॉन क्लासिक इनफेनटाइल और लेट ऑनसेट शामिल है।


क्लासिक इनफेनटाइल में शिशु में पहले तीन में ही लक्षण दिखने लगते है, जिसमें कमजोर मांसपेशियां, सांस लेने वाली मांसपेशियों में कमज़ोरी और दिल की मांसपेशियां कमजोर होना शामिल है। नॉन क्लासिक इनफेनटाइल में लक्षण तब उभरकर सामने आते है जब शिशु एक साल का होता है। लक्षण साल के बाद भी यानि कि देर से भी नजर आ सकते हैं। जो बच्चे इस बीमारी से पीडि़त होते हैं उनमें देखने सीखने की क्षमता में देरी होती है और मांसपेशियों और श्वसन कमजोर होता है। लेट ऑनसेट में हो सकता है कि लोगों को लक्षण किशोरावस्था या वयस्क होने तक भी न दिखे।
जेके लोन अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अशोक गुप्ता ने कहा कि यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक रोगी में लक्षणों की गंभीरता उसकी सेहत पर निर्भर करती है। इसके अलावा लक्षणों की गंभीरता भी भिन्न भिन्न होती है। यह शिशुओं के मुकाबले वयस्कों में हल्की हो सकती है। हमें यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इसके लक्षणों के प्रति जागरूकता होना बहुत आवश्यक है और समय पर तभी पहचान हो सकती है।

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