जिस कृष्ण की मूर्ति को मीरा ने बचपन में माना अपना पति, जयपुर में उसी से रचाया विवाह, जानें हकीकत

Savita Vyas

Publish: Aug, 24 2019 02:57:47 PM (IST) | Updated: Aug, 24 2019 02:57:48 PM (IST)

Jaipur, Jaipur, Rajasthan, India

जयपुर। कृष्ण और मीरा के प्रेम को शादी के गठबंधन में बांधने का साक्षी जयपुर शहर रहा है, जहां पूर्व राजपरिवार के महाराजा मानसिंह ने मीरा बाई का विवाह कृष्ण से कराया था। जयपुर के आमेर स्थित जगत शिरोमणि मंदिर को मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति के साथ मीरा बाई की मूर्ति विराजित है। विश्व में यह एक मात्र मंदिर है, जहां एक ही गर्भ गृह में विष्णु भगवान की प्रतिमा भी है और श्रीकृष्ण के विग्रह के साथ मीरा बाई की प्रतिमा भी स्थापित है।
कहा जाता है कि पूर्व राजपरिवार के महाराजा मानसिंह के बेटे जगत सिंह की सन् 1599 में मौत हो गई थी। इसके बाद महाराजा मानसिंह ने अपने बेटे जगत सिंह की याद में जगत शिरोमणी मंदिर बनाया। 1575-76 जब हल्दीघाटी का युद्ध हुआ तब महाराजा मानसिंह भगवान कृष्ण की मूर्ति वहां से लाए थे। यह वो ही कृष्ण की मूर्ति है, जिसकी मीरा बाई पूजा करती थीं। मानसिंह ने मूर्ति को महल में रखा। लोगों के विरोध के बाद मानसिंह ने मूर्ति को मंदिर में स्थापित किया।

तोरण गेट का किया निर्माण

मानसिंह ने मीरा को अपनी बहन का भाव देकर दोनों मूर्तियां का विवाह करवाकर यहां स्थापित किया। जब कृष्ण और मीरा की मूर्ति का विवाह हुआ तो मानसिंह ने राजस्थानी परंपरा के अनुसार तोरण गेट का निर्माण कराया। उस समय कृष्ण भगवान ने इसी गेट से तोरण मारा था। उस समय इस तोरण गेट की लागत 80 हजार रुपए आई थी। मंदिर का निर्माण 1599 में कराया गया था। उस दौरान पूरे मंदिर के निर्माण की लागत सवा 11 लाख रुपए थी। मंदिर में मानसिंह ने कृष्ण को घर जवाई के रूप में स्थापित किया था। साल में दो बार 1947 से पहले मीरा और कृष्ण तीज और गणगौर को सिटी पैलेस जाया करते थे। पहले सावन के महीने में कृष्ण और मीरा की मूर्ति को जल विहार कराया जाता था। कृष्ण और मीरा महीने भर यहीं रहते थे।आजादी के बाद यह परिपाटी खत्म हो गई है।

मुगल और जैन शैली की दिखती है छाप

आमेर किले के पीछे स्थापित इस मंदिर में हिंदू शैली के साथ-साथ मुगल और जैन शैली भी देखने को मिलती है। यहां विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा विशाल छतरी के नीचे स्थापित है। इस छतरी में जैन शैली और दक्षिण भारतीय शैली दोनों का संगम देखने को मिलता है। मंदिरों में सभी कृष्ण की मूर्तियों में बांकापन होता है, लेकिन इस मंदिर की खासियत है कि कृष्ण चरणों में ही बांकापन है और पूरी मूर्ति सीधी है।

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